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Harish Rana euthanasia: “सबको माफ करते हुए जाओ…” इच्छामृत्यु से पहले हरीश राणा का वीडियो वायरल

Harish Rana euthanasia

Harish Rana euthanasia: भारत के कानूनी और मानवीय इतिहास में एक अत्यंत भावुक क्षण दर्ज होने जा रहा है। देश में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी इच्छामृत्यु के पहले आधिकारिक मामले के नायक हरीश राणा को अब इस दुनिया से विदा किया जा रहा है। पिछले 13 वर्षों से बिस्तर पर ‘जिंदा लाश’ बनकर रह रहे हरीश का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसने करोड़ों लोगों की आँखों को नम कर दिया है। इस वीडियो में ब्रह्मकुमारी संस्थान की एक दीदी हरीश के माथे पर तिलक लगाते हुए उन्हें शांति से विदा होने की प्रेरणा दे रही हैं। उनके शब्द, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ… ठीक है…”, मानवीय संवेदनाओं की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं।

Harish Rana euthanasia: 22 सेकेंड का वीडियो: खामोश आँखों की तड़प

सोशल मीडिया पर प्रसारित यह 22 सेकेंड का वीडियो केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि हरीश के 13 साल के संघर्ष का निचोड़ है। वीडियो में जब ब्रह्मकुमारी परिवार की दीदी लवली हरीश के माथे पर हाथ रखती हैं, तो हरीश की आँखों में एक अजीब सी हलचल और इशारा दिखाई देता है। उनके कांपते होंठ और कुछ निगलने की कोशिश यह बयां करती है कि शायद उस अचेतन अवस्था में भी वे इस विदाई को महसूस कर पा रहे थे। गाजियाबाद स्थित उनके निवास से जब उन्हें अंतिम बार एम्स (AIIMS) ले जाया गया, तो वहां का माहौल अत्यंत शोकाकुल था।

Harish Rana euthanasia: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और परिवार का दर्द

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक सुनवाई के बाद हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। हरीश का परिवार लंबे समय से उनके कष्ट को देखते हुए इस राहत की मांग कर रहा था। हरीश के पिता अशोक राणा ने नम आँखों से परिवार और समाज से माफी मांगते हुए कहा कि एक पिता के लिए अपने बेटे को इस तरह विदा करना सबसे कठिन निर्णय है, लेकिन हरीश की असहनीय पीड़ा को देखते हुए यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया था। यह मामला भारत में ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) की बहस को एक नई दिशा दे रहा है।

https://x.com/i/status/2033136532555808811

इंजीनियरिंग छात्र से ‘वेजिटेटिव स्टेट’ तक का सफर

हरीश राणा की कहानी एक होनहार छात्र के सपनों के टूटने की दास्तां है। 13 साल पहले एक मेधावी इंजीनियरिंग छात्र रहे हरीश एक भीषण हादसे का शिकार हो गए थे। इस दुर्घटना ने उन्हें ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में पहुँचा दिया। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इस स्थिति में व्यक्ति न तो बोल सकता है, न चल सकता है और न ही बाहरी दुनिया से कोई संवाद कर सकता है। हरीश 13 वर्षों तक केवल मशीनों और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सहारे सांस ले रहे थे। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उनके स्वास्थ्य में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची थी।

इच्छामृत्यु का कानूनी पहलू और एम्स में अंतिम प्रक्रिया

हरीश को अब एम्स दिल्ली लाया जा चुका है, जहाँ डॉक्टरों की एक विशेष टीम की देखरेख में उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम से धीरे-धीरे अलग किया जाएगा। भारत में यह पहला मामला है जहाँ कानूनी अनुमति के बाद किसी व्यक्ति को इस तरह सम्मानजनक विदाई दी जा रही है। ब्रह्मकुमारी समाज से जुड़े होने के कारण उनका परिवार इसे एक ‘आत्मा की मुक्ति’ के रूप में देख रहा है। यह मामला न केवल एक परिवार के अंतहीन इंतजार की समाप्ति है, बल्कि भारतीय कानून व्यवस्था के लिए भी एक नजीर है जो जीवन और मृत्यु के बीच के सूक्ष्म अंतर को परिभाषित करता है।

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