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Kidney Health Alert: बीपी और शुगर बन सकते हैं किडनी फेलियर का कारण, इन लक्षणों को न करें अनदेखा

Kidney Health Alert

Kidney Health Alert : आधुनिक जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव के कारण आज ‘साइलेंट किलर’ मानी जाने वाली बीमारियां जैसे हाई ब्लड प्रेशर (बीपी) और डायबिटीज (मधुमेह) बेहद आम हो गई हैं। ये दो ऐसी स्वास्थ्य स्थितियां हैं, जो न केवल खुद में गंभीर हैं, बल्कि शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को भी धीरे-धीरे खोखला कर देती हैं। इनमें सबसे संवेदनशील अंग है हमारी ‘किडनी’। लंबे समय तक अनियंत्रित शुगर और बीपी के कारण किडनी की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि शुरुआती चरणों में इसके लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि लोग इन्हें नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे समस्या अंततः घातक रूप ले लेती है।

किडनी की कार्यप्रणाली और उस पर बढ़ता दबाव

किडनी हमारे शरीर के भीतर एक ‘फिल्टर’ की तरह कार्य करती है। इसका मुख्य कार्य रक्त से विषाक्त पदार्थों (टॉक्सिन्स) को बाहर निकालना, इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाना और शरीर में तरल पदार्थों की मात्रा को नियंत्रित करना है। जब किडनी स्वस्थ होती है, तो शरीर का मेटाबॉलिज्म सही रहता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मधुमेह या उच्च रक्तचाप रहता है, तो किडनी की इन सूक्ष्म छलनियों (नेफ्रॉन्स) पर अतिरिक्त दबाव बढ़ने लगता है। कई बार व्यक्ति को तब तक किसी गंभीर समस्या का एहसास नहीं होता, जब तक कि उसकी किडनी 50 से 60 प्रतिशत तक क्षतिग्रस्त न हो जाए।

हाई बीपी और डायबिटीज कैसे पहुँचाते हैं नुकसान?

किडनी के भीतर खून को साफ करने वाली बेहद महीन रक्त वाहिकाएं (ब्लड वेसल्स) होती हैं। डायबिटीज की स्थिति में रक्त में मौजूद अतिरिक्त शुगर इन वाहिकाओं को संकुचित और कठोर कर देती है। वहीं, हाई बीपी इन कोमल नसों पर इतना तेज प्रहार करता है कि वे फटने या ब्लॉक होने लगती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के सबसे बड़े कारणों में से एक डायबिटीज ही है। जब ब्लड प्रेशर और शुगर दोनों एक साथ अनियंत्रित होते हैं, तो किडनी की फिल्टर करने की क्षमता तेजी से घटने लगती है, जिससे प्रोटीन पेशाब के जरिए शरीर से बाहर निकलने लगता है और टॉक्सिन्स अंदर जमा होने लगते हैं।

सावधानी ही बचाव: क्रॉनिक स्टेज से पहले संभलना जरूरी

यदि समय रहते इन दोनों बीमारियों को दवा और परहेज से नियंत्रित न किया जाए, तो यह स्थिति ‘एंड-स्टेज रीनल डिजीज’ में बदल सकती है। इस चरण पर पहुँचने के बाद मरीज के पास केवल डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट का ही विकल्प बचता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, किडनी के रोगों को अक्सर ‘स्मार्ट बीमारी’ कहा जाता है क्योंकि ये अपना प्रभाव बहुत धीमी गति से दिखाते हैं। इसलिए, यदि आप इनमें से किसी भी बीमारी से ग्रसित हैं, तो केवल लक्षणों का इंतजार न करें, बल्कि नियमित जांच और डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना ही एकमात्र सुरक्षा कवच है।

किडनी की विफलता के शुरुआती संकेत और चेतावनी

शरीर में किडनी का काम प्रभावित होने पर कुछ खास बदलाव दिखने लगते हैं। इनमें सबसे प्रमुख है चेहरे, हाथों और पैरों में सूजन आना, क्योंकि शरीर से पानी बाहर नहीं निकल पाता। इसके अलावा, अत्यधिक थकान, कमजोरी, एकाग्रता की कमी और भूख न लगना भी इसके लक्षण हो सकते हैं। पेशाब की मात्रा में कमी आना, पेशाब का रंग गहरा होना या उसमें झाग बनना इस बात का संकेत है कि शरीर से प्रोटीन का रिसाव हो रहा है। रात के समय बार-बार पेशाब आने की इच्छा होना या सांस फूलना भी किडनी से जुड़ी जटिलताओं की ओर इशारा करता है।

किडनी को स्वस्थ रखने के प्रभावी उपाय

किडनी की सुरक्षा के लिए सबसे बुनियादी कदम अपने ब्लड प्रेशर (120/80 mmHg) और ब्लड शुगर को सामान्य बनाए रखना है। अपनी डाइट में नमक और चीनी की मात्रा को न्यूनतम करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, लेकिन यदि पहले से कोई समस्या है तो डॉक्टर की बताई मात्रा का ही पालन करें। नियमित व्यायाम, धूम्रपान से दूरी और तनाव मुक्त जीवन किडनी के स्वास्थ्य के लिए वरदान साबित होते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी प्रकार की ‘पेन किलर’ (दर्द निवारक) दवाओं का सेवन न करें, क्योंकि ये सीधे किडनी पर बुरा असर डालती हैं। हर 6 महीने में ‘किडनी फंक्शन टेस्ट’ (KFT) करवाना एक समझदारी भरा निर्णय है।

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