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Stray Dogs Case : आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, डॉग लवर्स की याचिकाएं खारिज

Stray Dogs Case

Stray Dogs Case :  देशभर में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक और उनके काटने की दर्दनाक घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को हटाने के अपने पुराने आदेश में किसी भी तरह का संशोधन या बदलाव करने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है।

इस मामले में विभिन्न डॉग लवर्स (श्वान प्रेमियों) और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 7 नवंबर को जारी किए गए दिशानिर्देशों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि वह देश के मासूम बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों की सुरक्षा से समझौता नहीं कर सकता।

टेक्स्ट और त्वरित संदेश सेवा

इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ द्वारा की जा रही थी। बेंच ने इस साल 29 जनवरी को सभी पक्षों, राज्यों, नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) और एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में कुत्तों के काटने की भयावह घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जहां मासूम बच्चों को बेरहमी से काटा गया है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) फ्रेमवर्क 2001 में शुरू हुआ था, लेकिन बढ़ती आबादी के अनुपात में संसाधनों और प्लानिंग की भारी कमी रही है। बिना ठोस योजना के चलाई गई नसबंदी और टीकाकरण ड्राइव पूरी तरह से विफल साबित हुई हैं।

नेशनल हाईवे अथॉरिटी को कड़े निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने पहले इस मामले की शुरुआत कुछ चुनिंदा क्षेत्रों से की थी, लेकिन बाद में इसकी गंभीरता को देखते हुए इसका दायरा पूरे देश के लिए बढ़ा दिया गया। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और सभी राज्य सरकारों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि वे नेशनल हाईवे, बड़े अस्पतालों, सरकारी व निजी कॉलेजों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों के आसपास से आवारा जानवरों और आक्रामक कुत्तों को तुरंत हटाएं।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि जिन कुत्तों में रेबीज के लक्षण नहीं हैं और जो आक्रामक नहीं हैं, उन्हें नगर निगमों द्वारा पकड़कर, उनकी नसबंदी और टीकाकरण करने के बाद वापस उसी सुरक्षित इलाके में छोड़ा जा सकता है जहां से उन्हें रेस्क्यू किया गया था।

कुत्ता काटे तो किसकी जवाबदेही?

अदालत ने देश में पहली बार आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों (फीडर्स) की कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी तय करने की बात कही है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यदि किसी क्षेत्र में आवारा कुत्ते के हमले से किसी नागरिक को गंभीर चोट आती है या उसकी असमय मृत्यु होती है, तो इसके लिए केवल नगर निकाय ही जिम्मेदार नहीं होगा, बल्कि उस क्षेत्र में उन कुत्तों को नियमित रूप से खाना खिलाने वाले लोग भी बराबर के दोषी माने जाएंगे। कोर्ट ने दो टूक कहा, “ऐसा नहीं हो सकता कि आप रोजाना शौक से किसी कुत्ते को खाना खिलाएं, लेकिन जब वही कुत्ता किसी राहगीर को अपना शिकार बना ले, तो आप जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लें।” इस विफलता के लिए स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करने से भी कोर्ट पीछे नहीं हटेगा।

असम के डरावने आंकड़े

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान देश के विभिन्न राज्यों, विशेषकर असम से आए आवारा कुत्तों के काटने के सरकारी आंकड़ों पर गहरी चिंता और हैरानी व्यक्त की। कोर्ट ने इन आंकड़ों को बेहद भयावह और डरावना बताया। आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, असम में वर्ष 2024 के भीतर कुल 1.66 लाख कुत्ते के काटने की घटनाएं दर्ज की गईं। वहीं, वर्ष 2025 के शुरुआती महीने यानी केवल जनवरी में ही यह संख्या 20,900 के पार पहुंच गई थी। इन खौफनाक आंकड़ों को देखने के बाद अदालत ने उन राज्यों को कड़ी चेतावनी दी है जो इस गंभीर जनहित के मुद्दे पर अदालतों में अस्पष्ट, भ्रामक या ढीले बयान पेश कर रहे हैं।

क्या थे 2025 के मुख्य निर्देश?

सुप्रीम कोर्ट ने देश में आवारा कुत्तों की आबादी और जनसुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए वर्ष 2025 में 7 प्रमुख निर्देश जारी किए थे, जो इस प्रकार हैं:

  1. अनिवार्य नसबंदी और टीकाकरण: सभी स्थानीय नगर निगमों को अपने क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को पकड़कर उनकी वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी, एंटी-रेबीज टीकाकरण और डिवार्मिंग (कीड़े मारने की दवा) सुनिश्चित करनी होगी।

  2. समान क्षेत्र में वापसी: सामान्य और शांत प्रवृत्ति के स्वस्थ कुत्तों को चिकित्सा प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसी वार्ड या क्षेत्र में वापस छोड़ा जाएगा जहां से उन्हें पकड़ा गया था।

  3. संक्रमित कुत्तों को आइसोलेशन: जो कुत्ते जानलेवा रेबीज बीमारी से ग्रसित हैं या अत्यधिक आक्रामक और हिंसक व्यवहार करते हैं, उन्हें किसी भी कीमत पर समाज के बीच वापस नहीं छोड़ा जाएगा। उन्हें परमानेंट शेल्टर होम या डॉग पाउंड में रखा जाएगा।

  4. सार्वजनिक फीडिंग पर पाबंदी: आम सड़कों, गलियों, फुटपाथों या व्यस्त सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खुले में भोजन कराने पर पूरी तरह रोक रहेगी।

  5. निर्धारित फीडिंग जोन का निर्माण: प्रत्येक नगर निगम वार्ड और सोसायटी को कुत्तों के लिए अलग से ‘डेजिग्नेटेड फीडिंग जोन’ बनाने होंगे, जहां उचित बोर्ड और साफ-सफाई की व्यवस्था होगी।

  6. अति-संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा: स्कूल, कॉलेज, खेल परिसर, अस्पताल, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों जैसी भारी भीड़भाड़ वाली जगहों को पूरी तरह से कुत्ता-मुक्त जोन घोषित किया जाएगा।

  7. राष्ट्रीय श्वान प्रबंधन नीति: केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर पूरे भारत में एक समान रूप से लागू होने वाली मजबूत और प्रभावी ‘राष्ट्रीय आवारा कुत्ता प्रबंधन नीति’ तैयार करने का आदेश दिया गया था।

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत 28 जुलाई 2025 को हुई थी, जब देश भर में आवारा कुत्तों के हिंसक हमलों और नवजातों की मौतों के कई विचलित करने वाले वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। इन वीडियो का संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) याचिका दर्ज की थी। इसके बाद, 11 अगस्त 2025 को कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर प्रशासन को आदेश दिया था कि 8 हफ्ते के भीतर सभी आवारा कुत्तों को सड़कों से हटाकर शेल्टर होम भेजा जाए।

इस कड़े आदेश के बाद देशभर के डॉग लवर्स भड़क उठे थे और उन्होंने दिल्ली के इंडिया गेट सहित देश के कई बड़े हिस्सों में कड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। भारी जनाक्रोश और पशु अधिकारों को ध्यान में रखते हुए 22 अगस्त 2025 को कोर्ट ने अपने आदेश को व्यावहारिक बनाते हुए उसमें आवश्यक संशोधन किए थे, जिसे अब अंतिम रूप से बरकरार रखा गया है।

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