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Teejan Bai Passed Away: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन, पंडवानी गायिकी की महान आवाज हमेशा के लिए खामोश

Teejan Bai Passed Away

Teejan Bai Passed Away: छत्तीसगढ़ की माटी की गौरवशाली पहचान और विश्व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका पद्म विभूषण तीजन बाई का आज सुबह लगभग 3:15 बजे रायपुर एम्स में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन की खबर से न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश-विदेश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है और देर रात उनके परिजनों से फोन पर बात कर उनका हाल-चाल जाना था। उनकी बहू रेणु तीजन बाई ने बताया कि उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे रीति-रिवाज और राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली महागाथा

तीजन बाई ने पंडवानी जैसी कठिन और पुरुष-प्रधान लोक विधा को अपनी अनूठी गायन शैली, अभिनय और ओजस्वी आवाज से न केवल जीवित रखा, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया। महाभारत की कथाओं को अपनी भावपूर्ण प्रस्तुतियों से जीवंत करने वाली तीजन बाई ने अपनी मेहनत और कला के प्रति समर्पण के बल पर छत्तीसगढ़ का नाम वैश्विक पटल पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया। दुशासन वध के प्रसंग पर उनकी प्रस्तुति ने दुनियाभर के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। 1980 के दशक से ही उन्होंने एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, टर्की और जापान जैसे देशों की यात्रा कर भारतीय संस्कृति का परचम लहराया।

संघर्ष और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायी यात्रा

तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के अटारी गांव में हुआ था। लोकपर्व ‘तीज’ के दिन जन्म लेने के कारण उनका नाम तीजन रखा गया। उनका बचपन अत्यंत अभावों में बीता, लेकिन संगीत के प्रति उनकी रुचि बचपन से ही प्रगाढ़ थी। अपने चचेरे नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी सीखने का निर्णय उनके लिए एक क्रांतिकारी कदम था। उस समय समाज में लड़कियों द्वारा सार्वजनिक रूप से पंडवानी गाना वर्जित माना जाता था। उन्होंने समाज और परिवार के भारी विरोध का सामना किया और यहां तक कि उन्हें घर से भी निकाल दिया गया, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। 13 वर्ष की आयु में चंदखुरी गांव में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति के बाद उनकी ख्याति दुर्ग, रायपुर और भोपाल तक फैल गई।

सम्मानों की लंबी फेहरिस्त

लोक कला के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा। 1988 में उन्हें ‘पद्मश्री’, 2003 में ‘पद्म भूषण’ और वर्ष 2019 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2017 में डी.लिट की मानद उपाधि और जापान के प्रतिष्ठित ‘फुकोका पुरस्कार’ सहित अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें कुल चार बार डी.लिट की उपाधि से अलंकृत किया गया, जो उनकी विद्वत्ता और कला की गहराई का प्रमाण है।

एक प्रेरणास्त्रोत के रूप में विरासत

तीजन बाई का जीवन न केवल एक कलाकार के रूप में, बल्कि एक सामाजिक संघर्षकर्ता के रूप में भी जाना जाएगा। उन्होंने साक्षरता, महिला अधिकारों और लोक कला के संरक्षण के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। संघर्ष, समर्पण और प्रतिभा के दम पर उन्होंने पंडवानी को जो वैश्विक ऊंचाइयां प्रदान कीं, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव मार्गदर्शक बनी रहेंगी। तीजन बाई आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पंडवानी की गूंज और उनकी ओजस्वी आवाज छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में सदैव जीवित रहेगी। लोक कला का यह महान स्तंभ सदैव कला प्रेमियों के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़े रहेगा।

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