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George Kurian Resignation : केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन ने दिया इस्तीफा

George Kurian Resignation

George Kurian Resignation : मोदी सरकार में मत्स्य पालन और अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रधानमंत्री की सलाह पर संविधान के अनुच्छेद 75 के खंड (2) के तहत उनके इस्तीफे को तत्काल प्रभाव से मंजूर कर लिया है। कुरियन के इस अचानक इस्तीफे के पीछे का प्रमुख कारण उनकी संसदीय सदस्यता का समाप्त होना है। वे अब संसद के किसी भी सदन (राज्यसभा या लोकसभा) के सदस्य नहीं रहे, जिसके चलते संवैधानिक बाध्यता के कारण उन्हें अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

राज्यसभा कार्यकाल की समाप्ति बनी इस्तीफे की मुख्य वजह

जॉर्ज कुरियन को अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुना गया था, जहाँ उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया के लोकसभा में जाने के बाद खाली हुई सीट संभाली थी। उनका यह राज्यसभा कार्यकाल बीते 21 जून को समाप्त हो गया। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में उन्हें पुनः उम्मीदवार नहीं बनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप वे संसद सदस्य नहीं रहे। भारतीय संविधान के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तो वह केवल छह महीने तक ही मंत्री पद पर बना रह सकता है। अपनी सदस्यता खो देने के कारण कुरियन ने नैतिकता के आधार पर और संवैधानिक नियमों का पालन करते हुए मंत्री पद छोड़ना ही उचित समझा।

केरल में ईसाई मतदाताओं को साधने की राजनीतिक रणनीति

जब मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के गठन के समय वरिष्ठ नेता जॉर्ज कुरियन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था, तो यह निर्णय केरल की राजनीति के लिए एक बड़ा सरप्राइज था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी ने केरल के आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए यह रणनीतिक कदम उठाया था। केरल की कुल आबादी में ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 17 फीसदी है। राज्य में बीजेपी का लोकसभा खाता खोलने में त्रिशूर सीट से सुरेश गोपी की ऐतिहासिक जीत का श्रेय ईसाई मतदाताओं के समर्थन को दिया गया। कुरियन को मंत्री बनाना इसी दिशा में ईसाई समुदाय को एक सकारात्मक संदेश देने की भाजपा की बड़ी कोशिश थी।

बीजेपी के साथ लंबा सफर और कुरियन का अनुभव

जॉर्ज कुरियन का राजनीतिक करियर काफी विस्तृत और बीजेपी के शुरुआती दौर से जुड़ा रहा है। वे 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के समय से ही पार्टी से जुड़ गए थे। अपने दशकों लंबे राजनीतिक सफर के दौरान उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। इसके अलावा, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान, जब ओ. राजगोपाल रेल राज्य मंत्री थे, तब कुरियन ने उनके ओएसडी (OSD) के रूप में कार्य करते हुए शासन का अनुभव प्राप्त किया था।

आगे की राह और राजनीतिक प्रभाव

जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में एक बड़ा रिक्त स्थान छोड़ गया है। हालांकि यह एक तकनीकी और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया निर्णय है, लेकिन केरल की राजनीति में इसका असर अवश्य दिखाई देगा। बीजेपी अब राज्य में अपने आधार को और मजबूत करने के लिए नए समीकरणों पर विचार कर रही है। कुरियन का हटना पार्टी के लिए एक अनुभवी चेहरे की कमी को दर्शाता है, लेकिन आने वाले समय में देखना होगा कि भाजपा केरल में अपने ईसाई आउटरीच कार्यक्रम को किस प्रकार आगे बढ़ाती है और भविष्य में कुरियन को पार्टी संगठन में क्या नई भूमिका दी जाती है।

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