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Bhojshala Temple : भोजशाला मंदिर में किस देवी की होती है पूजा, जानिए वाग्देवी का धार्मिक महत्व

Bhojshala Temple

Bhojshala Temple : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर पिछले काफी समय से देश में कानूनी और धार्मिक विवादों के केंद्र में रहा है. ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से बेहद खास माने जाने वाले इस प्राचीन स्थल पर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा और युगांतकारी फैसला सुनाया है. माननीय उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में इस विवादित स्थल को ‘वाग्देवी मंदिर’ के रूप में मान्यता दी है. अदालत के इस फैसले के बाद से देश भर के सांस्कृतिक और धार्मिक हलकों में चर्चाओं का बाजार बेहद गर्म हो गया है और इस ऐतिहासिक धरोहर को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है.

दो समुदायों के बीच आस्था का पुराना टकराव

सनातनी मान्यताओं के अनुसार, धार की इस ऐतिहासिक भोजशाला में ज्ञान, संगीत, विवेक और कला की अधिष्ठात्री देवी मां वाग्देवी की आराधना की जाती है, जिन्हें साक्षात मां सरस्वती का ही एक दिव्य स्वरूप माना जाता है. हिंदू समुदाय हमेशा से ही इस पूरे परिसर को मां सरस्वती का एक अत्यंत प्राचीन और पवित्र मंदिर मानता आया है. इसके विपरीत, मुस्लिम समुदाय का एक पक्ष लंबे समय से इस दावे का विरोध करता रहा है और इस पूरे विवादित ढांचे को ‘कमाल मौलाना मस्जिद’ होने का दावा प्रस्तुत करता रहा है. इतिहासकारों के अनुसार, इस भव्य और ऐतिहासिक मंदिर का मूल निर्माण परमार राजवंश के प्रतापी राजा भोज ने करवाया था.

मां वाग्देवी का स्वरूप और धार्मिक महत्व

पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मां वाग्देवी को साक्षात विद्या की देवी मां सरस्वती का ही दूसरा मुख्य रूप माना जाता है. वे संसार के समस्त मनुष्यों को ज्ञान, मधुर वाणी, उत्तम संगीत, कला और आत्म-अभिव्यक्ति प्रदान करने वाली सर्वोच्च अधिष्ठात्री देवी कही जाती हैं. सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, मां वाग्देवी प्रत्येक मनुष्य के अंतर्मन में अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और बुद्धि का अलौकिक प्रकाश जाग्रत करती हैं. शास्त्रों और पुराणों में मां वाग्देवी का जो स्वरूप वर्णित है, वह अत्यंत शांत, सौम्य और अलौकिक है, जो भक्तों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करता है.

पवित्रता और सृजन का अलौकिक प्रतीक

शास्त्रों के अनुसार, मां वाग्देवी सदैव अत्यंत धवल यानी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और वे श्वेत कमल के आसन पर विराजमान दिखाई देती हैं. माता का यह सौम्य रूप परम पवित्रता, सर्वोच्च ज्ञान और सृष्टि के सृजन का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. उनके हाथों में वीणा, ग्रंथ और माला सुशोभित होती है, जो कला और विद्या के संपूर्ण विकास को प्रदर्शित करती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो भी भक्त सच्चे मन से उनके इस शांत स्वरूप का ध्यान करता है, उसके जीवन से मानसिक विकार, जड़ता और अज्ञानता का पूरी तरह से नाश हो जाता है.

‘वाग्देवी’ शब्द का गहरा भाषाई और आध्यात्मिक अर्थ

व्याकरण और शब्द व्युत्पत्ति के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘वाग्देवी’ शब्द मुख्य रूप से दो अलग-अलग शब्दों के अनूठे मेल से बना है – ‘वाक्’ और ‘देवी’. इसमें पहले शब्द ‘वाक्’ का सीधा और स्पष्ट अर्थ ‘वाणी’, ‘ध्वनि’ या ‘शब्द’ से होता है. वहीं, दूसरे शब्द ‘देवी’ का तात्पर्य एक ‘दिव्य शक्ति’ या ‘ईश्वरीय सत्ता’ से लगाया जाता है. इन दोनों शब्दों को आपस में मिलाने पर वाग्देवी शब्द का संपूर्ण और वास्तविक अर्थ “वाणी की देवी” अथवा “शब्दों की अधिष्ठात्री देवी” के रूप में निकलकर सामने आता है. हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में मां सरस्वती को ज्ञान के साथ-साथ अभिव्यक्ति की सबसे बड़ी देवी माना गया है.

मां सरस्वती के विभिन्न नाम और विद्या का महत्व

सनातन हिंदू धर्म और पौराणिक साहित्यों में मां वाग्देवी को केवल एक ही नाम से नहीं, बल्कि कई अन्य पवित्र नामों से भी आदरपूर्वक पुकारा जाता है. इनके अन्य प्रमुख नामों में मां सरस्वती, माता शारदा, देवी भारती और मां वागीश्वरी जैसे अत्यंत कल्याणकारी नाम विशेष रूप से शामिल हैं. हिंदू संस्कृति में उन्हें समस्त ललित कलाओं, उच्च साहित्य, मधुर संगीत और संपूर्ण शिक्षा की जननी (माता) के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है. यही कारण है कि देश भर के तमाम विद्यार्थियों, शोधार्थियों, संगीतकारों और कलाकारों के जीवन में मां सरस्वती की विशेष आराधना और कृपा का अत्यंत विशिष्ट महत्व बताया गया है.

बसंत पंचमी के पावन पर्व पर विशेष आराधना

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी का पावन त्योहार मुख्य रूप से मां सरस्वती की साधना और आराधना को ही समर्पित होता है. इस पावन अवसर पर धार की ऐतिहासिक भोजशाला में भी प्रतिवर्ष बेहद विशेष पूजा-अर्चना, यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों का भव्य आयोजन किया जाता है. देश के कोने-कोने में बसंत पंचमी के शुभ दिन पर सभी स्कूलों, कॉलेजों और सांस्कृतिक केंद्रों में विद्यार्थी, शिक्षक, मूर्तिकार और संगीतकार एकत्र होकर मां वाग्देवी से ज्ञान, बुद्धि और कला का आशीर्वाद प्राप्त करने की मंगल कामना करते हैं.

मां वाग्देवी का परम कल्याणकारी सिद्ध मंत्र

शास्त्रों में मां वाग्देवी की प्रसन्नता और उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए एक बेहद प्रभावशाली और सिद्ध मूल मंत्र का उल्लेख किया गया है, जो इस प्रकार है:

“ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः”

ऐसी सुदृढ़ धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति दैनिक रूप से अथवा बसंत पंचमी के विशेष अवसर पर इस चमत्कारी मंत्र का पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ जाप करता है, उसे उत्तम ज्ञान, प्रखर बुद्धि, तीव्र स्मरण शक्ति और मधुर वाणी की प्राप्ति होती है. हाई कोर्ट के हालिया फैसले के बाद इस मंत्र और भोजशाला की ऐतिहासिकता का महत्व आम जनमानस के बीच और अधिक बढ़ गया है.

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