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Iran Foreign Minister reveal : ‘डील करीब थी, फिर बात बिगड़ गई’, ईरान के विदेश मंत्री ने खोली इस्लामाबाद वार्ता की पोल!

Iran Foreign Minister reveal : पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच चल रही उच्च स्तरीय शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई है। पिछले करीब 47-50 वर्षों के इतिहास में यह दोनों देशों के बीच हुई सबसे बड़े स्तर की सीधी बातचीत थी, जिससे पूरी दुनिया को पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के समाप्त होने की उम्मीद जगी थी। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट साझा करते हुए जानकारी दी कि यह डील सफल होते-होते रह गई। अराघची के अनुसार, दोनों पक्ष सहमति के बेहद करीब थे, लेकिन अंतिम क्षणों में अमेरिका के रुख ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।

Iran Foreign Minister reveal : “कुछ इंच दूर” थी सहमति: अब्बास अराघची का आरोप

ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने अपनी पोस्ट में लिखा कि इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच सहमति बस “कुछ इंच की दूरी” पर थी। उन्होंने अमेरिका पर बातचीत में बाधा डालने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि ईरान ने युद्ध को समाप्त करने के लिए पूरी ईमानदारी और सद्भावना के साथ मेज पर अपनी बात रखी थी। अराघची ने ‘इस्लामाबाद MoU’ (सहमति पत्र) का जिक्र करते हुए कहा कि जब समझौते पर हस्ताक्षर होने ही वाले थे, तभी अमेरिका ने अत्यधिक मांगें रख दीं और अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्यों को बदलना शुरू कर दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अमेरिका ने इतिहास से “कोई सबक नहीं सीखा है।”

Iran Foreign Minister reveal : अत्यधिक मांगें और बदलते लक्ष्य बने रुकावट

अराघची ने इस बात का विस्तार से खुलासा नहीं किया कि वे कौन सी विशिष्ट मांगें थीं जिनके कारण बातचीत विफल हुई, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका की जिद और निरंतर बदलते लक्ष्यों के कारण समझौता नहीं हो सका। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि “सद्भावना से सद्भावना पैदा होती है और दुश्मनी से दुश्मनी।” अराघची की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि ईरान ने अपनी ओर से लचीला रुख अपनाया था, लेकिन अमेरिकी पक्ष की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ वाली रणनीति ने शांति की कोशिशों को बाधित कर दिया।

राष्ट्रपति पेज़ेशकियन का बयान: “तानाशाही छोड़ने पर ही बनेगी बात”

अराघची की टिप्पणी से कुछ घंटे पहले ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी। राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि समझौते की उम्मीदें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं, लेकिन इसके लिए अमेरिका को अपना रवैया बदलना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि अमेरिकी सरकार अपनी “तानाशाही” छोड़ देती है और ईरानी राष्ट्र के अधिकारों का सम्मान करती है, तो भविष्य में किसी सहमति तक पहुँचने के रास्ते निश्चित रूप से खुल सकते हैं। पेज़ेशकियन ने अपनी बातचीत करने वाली टीम, विशेष रूप से डॉ. क़ालिबफ़ की सराहना की और उन्हें इस कठिन दौर में शक्ति बनाए रखने की कामना की।

होर्मुज स्ट्रेट और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

इस्लामाबाद वार्ता की विफलता का सीधा असर अब वैश्विक बाजार और रणनीतिक क्षेत्रों पर पड़ने लगा है। इस डील के टूटने के तुरंत बाद होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और तेल निर्यात को लेकर तनाव फिर से चरम पर पहुँच गया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उम्मीद थी कि इस वार्ता से मध्य पूर्व में स्थिरता आएगी, लेकिन अब स्थिति पहले से अधिक अनिश्चित हो गई है। अराघची का बयान यह साफ करता है कि कूटनीतिक मेज पर गतिरोध अभी बना हुआ है और शांति की राह अब और लंबी होती नजर आ रही है।

भविष्य की संभावनाएं और अनिश्चितता

इस्लामाबाद में हुई इस वार्ता का बेनतीजा रहना केवल दो देशों की विफलता नहीं है, बल्कि यह पश्चिम एशिया में शांति बहाली की कोशिशों को लगा एक बड़ा झटका है। एक तरफ जहां ईरान ने अमेरिका पर आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मान रहे हैं कि परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दों पर अभी भी दोनों देशों के बीच गहरी खाई मौजूद है। जब तक विश्वास बहाली के ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक इस तरह की ऐतिहासिक वार्ताओं का परिणाम इसी तरह का रहेगा। अब दुनिया की नजरें अमेरिका की अगली प्रतिक्रिया और ईरान के भविष्य के कदम पर टिकी हैं।

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