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West Bengal Politics : ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ से टीएमसी में हड़कंप, अकेले दिल्ली पहुंचे सांसद अभिषेक बनर्जी

West Bengal Politics

West Bengal Politics : पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर और अभूतपूर्व अंदरूनी संकट से जूझ रही है। पार्टी के संसदीय दल में एक बहुत बड़े विद्रोह की आशंकाओं के बीच राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अचानक शनिवार को देश की राजधानी दिल्ली पहुंच गए हैं। राजनीतिक सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अपने भतीजे अभिषेक को निर्धारित समय से एक दिन पहले ही दिल्ली रवाना होने का कड़ा निर्देश दिया था। इस अचानक और अप्रत्याशित दौरे के बाद कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में भारी खलबली मच गई है।

अभिषेक का कूटनीतिक दौरा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक बनर्जी का यह दिल्ली दौरा टीएमसी के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित हो सकता है। ममता बनर्जी ने उन्हें सोमवार को होने वाली सांसदों की महत्वपूर्ण बैठक से पहले दिल्ली में जमीनी हकीकत और पार्टी सांसदों के रुख का सटीक आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी है। यह संकट ऐसे समय में आया है जब सोमवार को ही विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर मामले में अभिषेक बनर्जी को सीआईडी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होना है। जांच एजेंसी ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पूछताछ से अतिरिक्त समय मांगने की उनकी विशेष याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था।

‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ से हिली पार्टी

बंगाल की राजनीति में असली भूचाल तब आया जब विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने अभिषेक बनर्जी के बढ़ते एकतरफा प्रभाव और कार्यशैली के खिलाफ खुली बगावत का बिगुल फूंक दिया। इस बगावती अभियान को बागी गुट द्वारा ‘ऑपरेशन क्राउन प्रिंस’ का कूटनाम दिया गया है, जिसने टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व की रात की नींद उड़ा दी है। इन सभी बागी विधायकों ने हाल ही में निष्कासित किए गए नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट होकर विधानसभा के भीतर खुद को एक अलग और मुख्य विपक्षी गुट के रूप में मान्यता भी दिला दी है, जो पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका है।

संसदीय दल में भी बड़ी टूट का खतरा

विद्रोह की यह आग अब सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है बल्कि दिल्ली के संसद भवन तक पहुंच चुकी है। बागी विधायकों के नए उपनेता संदीपन साहा ने सनसनीखेज दावा किया है कि दिल्ली में भी बंगाल की तर्ज पर संसदीय दल के भीतर बड़ी टूट की पटकथा लिखी जा रही है। साहा ने आरोप लगाया कि वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी की तानाशाही से बेहद आहत हैं। वर्तमान में हाजी नूरुल इस्लाम के असमय निधन के बाद लोकसभा में टीएमसी के पास 28 सांसद बचे हैं। ऐसे में दल-बदल विरोधी कानून की मार से सुरक्षित बचने के लिए किसी भी बागी गुट को कम से कम दो-तिहाई यानी 19 लोकसभा सांसदों के समर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होगी।

दोनों सदनों के सांसदों पर बागियों की पैनी नजर

लोकसभा के साथ-साथ राज्यसभा में भी तृणमूल कांग्रेस के पास 13 सांसदों का मजबूत बल है, जिन पर बागी नेताओं ने अपनी पैनी नजरें टिका दी हैं। दिल्ली में डेरा डाले बागी गुट के रणनीतिकारों ने शुक्रवार की देर रात से ही वफादार और असमंजस में पड़े सांसदों से फोन पर गुप्त संपर्क साधना शुरू कर दिया है। संसद के दोनों सदनों में पार्टी को विभाजित करने और सांसदों को अपने पाले में लाने के प्रयास युद्ध स्तर पर जारी हैं। इस बीच, पार्टी के कई सांसद भविष्य को लेकर पूरी तरह अनिश्चित दिखाई दे रहे हैं और रविवार को अभिषेक बनर्जी के दिल्ली के राजनीतिक कार्यक्रमों पर करीब से नजर रख रहे हैं।

वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय का बीजेपी पर बड़ा आरोप

इस चौतरफा घमासान और बगावत के दावों के बीच टीएमसी के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी सांसद सौगत रॉय ने पार्टी में किसी भी तरह के बिखराव की खबरों को सिरे से खारिज किया है। सौगत रॉय ने भारतीय जनता पार्टी पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी बंगाल विधानसभा की तरह अब देश की संसद में भी अनैतिक ऑपरेशन चलाकर क्षेत्रीय पार्टियों को तोड़ने की साजिश रच रही है। उन्होंने दृढ़ विश्वास के साथ कहा कि ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन में इससे भी बड़ी और कठिन लड़ाइयां जीती हैं और वह इस संकट से उबरकर एक बार फिर बेहद शानदार और दमदार वापसी करेंगी।

डैमेज कंट्रोल और संसदीय दल की एकता

भले ही पार्टी के वफादार नेता मीडिया की इन खबरों को विपक्ष द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया प्रोपेगैंडा बता रहे हों, लेकिन धरातल पर हफ्ता भर पहले की तुलना में तृणमूल कांग्रेस की राहें अब बेहद पथरीली और अनिश्चित हो चुकी हैं। आंतरिक कलह और खुलकर सामने आई गुटबाजी ने पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया है। अब टीएमसी के शीर्ष आलाकमान के सामने अपने संसदीय कुनबे को बिखरने से बचाने और प्रभावी डैमेज कंट्रोल करने की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। पार्टी को यदि खुद को बचाना है, तो नाराज सांसदों और विधायकों को तुरंत मनाने के लिए एक नई और ठोस समन्वय नीति पर काम करना होगा।

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