Russia Nuclear Weapons : वर्तमान में वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों को लेकर मची होड़ और बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच रूस ने एक बार फिर अपनी परमाणु नीति पर स्पष्ट रुख अपनाया है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बुधवार, 24 जून 2026 को एक अत्यंत महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा कि परमाणु हथियार ही एकमात्र ऐसा साधन हैं जो दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध जैसी विनाशकारी आपदा से बचा सकते हैं। पेस्कोव के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था लगातार चरमरा रही है और इस जटिल स्थिति में ‘न्यूक्लियर डिटरेंस’ (परमाणु निवारण) ही एकमात्र प्रभावी सुरक्षा कवच के रूप में शेष बचा है। उनका यह बयान वैश्विक राजनीति में परमाणु हथियारों की महत्ता और उनके द्वारा बनाए जा रहे शक्ति संतुलन को दर्शाता है।
भविष्य की तकनीक और विनाशक क्षमता का उदय
दिमित्री पेस्कोव ने अपने संबोधन में भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में नई और अत्याधुनिक तकनीकों का विकास हो रहा है, जिनसे ऐसे गैर-परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं, जिनकी मारक और विनाशक क्षमता पारंपरिक परमाणु हथियारों के समकक्ष होगी। यद्यपि उन्होंने किसी विशेष राष्ट्र का नाम नहीं लिया, लेकिन वैश्विक जानकारों का मानना है कि यह चिंता चीन के तेजी से बढ़ते परमाणु जखीरे और ईरान के परमाणु कार्यक्रम के संदर्भ में है। डोनाल्ड ट्रंप जैसे वैश्विक नेताओं द्वारा इन देशों की बढ़ती परमाणु क्षमताओं को लेकर जताई गई चिंताएं इस खतरे को और अधिक प्रासंगिक बना देती हैं।
पुतिन का रुख और पश्चिमी देशों की आपत्तियां
यूक्रेन के साथ चार वर्षों से अधिक समय से चल रहे लंबे युद्ध के दौरान, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कई अवसरों पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का संकेत दिया है। पुतिन के इन बयानों ने अमेरिका और यूरोपीय देशों में गंभीर चिंता उत्पन्न की है। पश्चिमी देशों का स्पष्ट आरोप है कि रूस परमाणु शक्ति का उपयोग एक कूटनीतिक दबाव बनाने के उपकरण के रूप में कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका एक नई परमाणु संधि की वकालत कर रहा है, जिसमें चीन को भी सम्मिलित करने का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि, चीन ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से नकार दिया है। वहीं, रूस का तर्क है कि यदि किसी नई संधि में चीन को लाया जाता है, तो अमेरिका के सहयोगी राष्ट्रों जैसे ब्रिटेन और फ्रांस को भी समान रूप से जवाबदेही के दायरे में लाना होगा।
न्यू स्टार्ट संधि का समापन और बढ़ता परमाणु जोखिम
परमाणु हथियारों के नियंत्रण को लेकर दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती ‘न्यू स्टार्ट’ (NST) संधि का समापन है। फरवरी 2026 में इस महत्वपूर्ण संधि के समाप्त होने से अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों पर लगी सीमाएं अब प्रभावी नहीं रही हैं। 2010 में हस्ताक्षरित यह संधि दोनों देशों के परमाणु वॉरहेड की संख्या को 1,550 तक सीमित रखती थी, जो शीत युद्ध के बाद के सुरक्षा ढांचे का आधार थी। दुर्भाग्यवश, लंबे समय से एक-दूसरे पर समझौते के उल्लंघन के आरोपों के बीच यह संधि खत्म हो गई है। दशकों बाद यह पहली बार है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच हथियारों की तैनाती पर कोई प्रभावी संधि लागू नहीं है, जिससे संपूर्ण विश्व में परमाणु युद्ध की आशंकाओं को लेकर बहस और चिंता का वातावरण फिर से गहरा गया है।
