NEET Exam Controversy : मेडिकल प्रवेश परीक्षा (NEET) में हुई गड़बड़ियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान उच्च स्तरीय समिति के अध्यक्ष डॉ. राधाकृष्णन ने अदालत को बताया कि उन्होंने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) को प्रशासनिक और तकनीकी रूप से मजबूत करने के लिए कुल 60 अहम सुझाव दिए थे। इनमें से अधिकांश सिफारिशों को अमलीजामा पहनाया जा चुका है, जबकि कुछ अन्य सुझावों को लागू करने की प्रक्रिया अभी भी जारी है। उन्होंने दलील दी कि वर्ष 2025 में आयोजित हुई नीट यूजी (NEET-UG) परीक्षा काफी हद तक संतोषजनक रही थी। कुछ इक्का-दुक्का परीक्षा केंद्रों पर बिजली गुल होने जैसी छोटी-मोटी घटनाएं जरूर सामने आईं, लेकिन कुल मिलाकर सिफारिशों के असर से परीक्षा का सफल संचालन किया गया।
आगामी री-नीट परीक्षा के लिए सुरक्षा के किए गए हैं कड़े और पुख्ता इंतजाम
डॉ. राधाकृष्णन ने अदालत को आश्वस्त करते हुए कहा कि पूर्व में मुख्य रूप से प्रश्नपत्रों में हेराफेरी और गोपनीयता भंग होने की शिकायतें आई थीं। इन कमियों को दूर करने के लिए कई सुरक्षात्मक उपाय धरातल पर उतारे जा चुके हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को पूरा भरोसा दिलाया कि अगले महीने आयोजित होने वाली री-नीट (Re-NEET) परीक्षा के दौरान इन सभी संवेदनशील पहलुओं का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की गुंजाइश न रहे। इस दौरान जब जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पीबी नरसिम्हा की पीठ ने सवाल किया कि क्या यह सुधार समिति नियमित रूप से अपनी बैठकें आयोजित करती है, तो राधाकृष्णन ने इसका सकारात्मक जवाब दिया। हालांकि, बेंच ने टिप्पणी की कि जब तक वास्तविक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक असली समस्या का समाधान संभव नहीं है।
यूपीएससी जैसी संस्थाओं से सीख लेने की जरूरत
सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि जब तक हम अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी तय नहीं करेंगे, तब तक देश के युवाओं को सही और पारदर्शी व्यवस्था नहीं मिल पाएगी। यह करोड़ों छात्रों के भविष्य से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील मामला है। इस पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहतरीन मिसाल दी और कहा कि संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के परीक्षा संचालन में कभी भी इस तरह की गंभीर समस्याएं और पेपर लीक जैसी शिकायतें सामने नहीं आई हैं, एनटीए को इस प्रशासनिक ढांचे और कार्यप्रणाली को गहराई से समझना होगा। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार युवाओं के भविष्य को लेकर बेहद गंभीर है और सुरक्षा मानकों को लगातार अपग्रेड कर रही है।
क्षमता किसी एक व्यक्ति विशेष में नहीं
अदालत में जब सॉलिसिटर जनरल ने रेलवे भर्ती परीक्षाओं की शुचिता का उदाहरण दिया, तो सुप्रीम कोर्ट ने हमारे देश के प्रशासनिक ढांचे की एक बड़ी कमी की ओर इशारा किया। शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत की अधिकांश संस्थाओं में सबसे बड़ी समस्या तदर्थवाद (Ad-hocism) की है, जहां व्यवस्थाएं स्थायी होने के बजाय तात्कालिक रूप से चलाई जाती हैं। इसके कारण संस्थागत ज्ञान और अनुभवों का सही प्रसार आगे की पीढ़ियों में नहीं हो पाता है। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्यक्षमता किसी एक व्यक्ति विशेष में निहित नहीं होनी चाहिए, बल्कि वह पूरी संस्था और उसके सिस्टम के भीतर मौजूद होनी चाहिए ताकि नेतृत्व बदलने पर भी परीक्षा की शुचिता प्रभावित न हो।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा हलफनामा,
मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस नरसिम्हा ने अपने आदेश में दर्ज किया कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय (तत्कालीन एचआरडी) कोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दायर करेगा। इस हलफनामे में सरकार को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि भविष्य में परीक्षाओं के आयोजन और उसके समापन की पूरी प्रक्रिया को किस प्रकार पारदर्शी और फुलप्रूफ बनाया जाएगा। साथ ही, विशेषज्ञ कर्मचारियों की स्थायी नियुक्ति और संस्थागत विविधता के जरिए देश की परीक्षा प्रणाली की साख को कैसे बहाल रखा जाए, इसका खाका भी देना होगा।
अदालत का मुख्य प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि एनटीए के पास वर्ष 2024 अथवा 2026 की आगामी परीक्षाओं को पूरी तरह सुरक्षित ढंग से आयोजित करने के लिए पर्याप्त भौतिक और बौद्धिक संसाधन उपलब्ध हों। सरकार को यह हलफनामा 2 जुलाई से पहले दाखिल करना है। जब एसजी ने बताया कि प्रधानमंत्री स्वयं इस मामले की निगरानी कर रहे हैं, तो कोर्ट ने तंज कसते हुए कहा कि अगर इतने बड़े स्तर पर हस्तक्षेप की नौबत आ रही है, तो यह देश की संस्थाओं के लिए अत्यंत दुखद स्थिति है।
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