USCIRF vs India: अमेरिकी संस्था ‘यूएस कमिशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम’ (USCIRF) द्वारा मार्च 2026 में जारी की गई एक रिपोर्ट ने भारत में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इस रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगाने जैसे कट्टर सुझाव दिए गए हैं। इस कदम के विरोध में भारत के 275 प्रबुद्ध नागरिकों, जिनमें पूर्व जज, नौकरशाह और सैन्य अधिकारी शामिल हैं, ने एक संयुक्त बयान जारी कर रिपोर्ट को “गलत, पक्षपाती और भारत-विरोधी एजेंडे से प्रेरित” करार दिया है।
USCIRF vs India: USCIRF की रिपोर्ट को बताया ‘तथ्यहीन और दुर्भावनापूर्ण’
शनिवार, 21 मार्च 2026 को जारी किए गए एक साझा बयान में पूर्व अधिकारियों ने कहा कि यह रिपोर्ट किसी खास मकसद को साधने के लिए तैयार की गई है। उनका आरोप है कि रिपोर्ट तैयार करने वालों ने तथ्यों की गहराई से जांच नहीं की और बिना किसी ठोस सबूत के भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि खराब करने का प्रयास किया है। बयान में स्पष्ट किया गया कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को धूमिल करने के लिए इस तरह के “सोचे-समझके प्रचार” का सहारा लिया जा रहा है, जो पूरी तरह से अनैतिक है।
USCIRF vs India: RSS पर प्रतिबंध के सुझाव को बताया ‘तर्कहीन और बेकार’
अमेरिकी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में न केवल आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की बात कही, बल्कि उसकी संपत्ति जब्त करने और संगठन से जुड़े लोगों के आने-जाने (Travel Ban) पर रोक लगाने जैसे कठोर सुझाव भी दिए। भारतीय पूर्व अधिकारियों ने इन सुझावों को पूरी तरह से ‘बेकार और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ’ बताया है। उनका तर्क है कि आरएसएस जैसे सामाजिक संगठन, जो राष्ट्र निर्माण में योगदान देते हैं, उन्हें इस तरह निशाना बनाना धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर की जा रही राजनीति का हिस्सा है।
अमेरिकी सरकार से रिपोर्ट बनाने वालों की जांच की मांग
इस संयुक्त बयान के जरिए भारतीय पूर्व अधिकारियों ने अमेरिकी प्रशासन से एक बड़ी मांग की है। उन्होंने कहा कि जो लोग और संस्थाएं इस तरह की विवादित रिपोर्ट तैयार कर रही हैं, उनकी पृष्ठभूमि और मंशा की गहन जांच होनी चाहिए। बयान में आरोप लगाया गया कि कुछ भारत-विरोधी लॉबी सक्रिय है, जो ऐसी रिपोर्ट्स के जरिए दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियों (भारत और अमेरिका) के बीच बढ़ते भरोसे और रणनीतिक रिश्तों में दरार डालना चाहती हैं।
मजबूत भारतीय लोकतंत्र और न्यायिक व्यवस्था का हवाला
पूर्व अधिकारियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाया कि भारत एक जीवंत और मजबूत लोकतंत्र है। यहाँ की अदालतें, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करती हैं। बयान में कहा गया कि भारत में किसी भी स्तर पर धार्मिक आजादी का उल्लंघन होने की संभावना बहुत कम है क्योंकि यहाँ की न्यायिक व्यवस्था बेहद सतर्क है। इसलिए, किसी बाहरी संस्था द्वारा भारत के आंतरिक मामलों में दखल देना और मनगढ़ंत रिपोर्ट जारी करना कतई स्वीकार्य नहीं है।
बयान पर हस्ताक्षर करने वाले दिग्गज: जजों से लेकर राजदूतों तक का समर्थन
इस ऐतिहासिक संयुक्त बयान पर कुल 275 दिग्गजों ने हस्ताक्षर किए हैं। इसमें न्यायपालिका, प्रशासन और सेना के शीर्ष पदों पर रहे लोग शामिल हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं का विवरण इस प्रकार है:
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25 रिटायर्ड जज (उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय से संबंधित)
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119 पूर्व सरकारी अधिकारी (इनमें 10 पूर्व राजदूत भी शामिल हैं)
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131 पूर्व सैन्य अधिकारी (सेना के विभिन्न अंगों के वरिष्ठ अधिकारी)
प्रमुख नाम और बयान के सूत्रधार
इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में आदर्श कुमार गोयल, हेमंत गुप्ता (पूर्व जज), ओपी रावत, सुनील अरोड़ा (पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त) और कंवल सिब्बल (पूर्व विदेश सचिव) जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इस पूरे अभियान को संगठित करने और संयुक्त बयान तैयार करने में भास्वती मुखर्जी और एम. मदन गोपाल ने मुख्य भूमिका निभाई। इन सभी का मानना है कि भारत की संप्रभुता पर इस तरह के प्रहार का जवाब देना राष्ट्रीय कर्तव्य है।
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