Shiva Purana Legends : हिंदू धर्म और संस्कृति में देवों के देव महादेव और माता पार्वती के लाडले पुत्र भगवान गणेश को सर्वसम्मति से ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है। सनातन परंपरा के अनुसार, ब्रह्मांड में किसी भी देवी-देवता की आराधना से पहले सर्वप्रथम भगवान गणेश की ही स्तुति और पूजा-अर्चना की जाती है, यही कारण है कि उन्हें ‘प्रथम पूज्य’ के गौरवशाली नाम से विभूषित किया गया है। मान्यता है कि कोई भी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, यज्ञ या नया व्यवसाय जैसे शुभ कार्य भगवान गणेश के स्मरण के बिना अधूरे हैं। ऐसी सुदृढ़ आस्था है कि गणेश जी के पूजन से प्रारंभ हुए कार्यों में कभी कोई बाधा या विघ्न उत्पन्न नहीं होता और वह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होता है।
माता पार्वती के उबटन से जन्म: द्वारपाल की भूमिका और अद्भुत रहस्यमयी कथा
विघ्नहर्ता भगवान गणेश के प्राकट्य और उनके गजानन (हाथी के मुख वाले) बनने की जन्म कथा शास्त्रों में वर्णित अत्यंत प्रसिद्ध, कौतुकपूर्ण और रहस्यमयी कहानियों में से एक है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि एक बार माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने शरीर के उबटन (मैल) से एक अत्यंत सुंदर बालक की आकृति का निर्माण किया और अपनी योगशक्ति से उसमें प्राण फूंक दिए। यही दिव्य बालक आगे चलकर संपूर्ण सृष्टि में भगवान गणेश के रूप में पूजे गए। माता पार्वती ने कड़ा निर्देश देते हुए बालक गणेश को अपने भवन के मुख्य द्वार की रक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा था, जिसके पालन के दौरान एक ऐसी घटना घटी कि स्वयं महादेव को उनका सिर काटना पड़ा।
पिता और पुत्र का अनभिज्ञ टकराव: जब अज्ञानतावश महादेव का रास्ता रोका गया
पौराणिक कथा के विस्तार में जाएं तो जब माता पार्वती बालक गणेश को मुख्य द्वार पर पहरेदारी का जिम्मा सौंपकर भीतर स्नान करने चली गईं, तब वहां भगवान शिव उपस्थित नहीं थे। गणेश जी अपनी माता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए पूरी निष्ठा से द्वार की रक्षा कर रहे थे। इसी बीच महादेव वहां पहुंचे और सीधे भवन के भीतर प्रवेश करने लगे। चूंकि बालक गणेश अपने पिता शिव जी के वास्तविक स्वरूप से पूरी तरह अनभिज्ञ थे, इसलिए उन्होंने शिव जी को भीतर जाने से बलपूर्वक रोक दिया। गणेश जी ने अत्यंत विनम्रता परंतु दृढ़ता से महादेव से कहा कि माता की अनुमति के बिना कोई भी इस सीमा को पार नहीं कर सकता।
देवताओं के समझाने पर भी अड़े गणेश: महादेव के त्रिशूल से हुआ मस्तक विच्छेद
अज्ञानतावश बालक द्वारा रोके जाने पर त्रिलोकपति भगवान शिव को यह व्यवहार अत्यंत अनुचित और नागवार गुजरा। देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच विवाद की स्थिति निर्मित हो गई और बहस बढ़ती चली गई। स्थिति को बिगड़ता देख भगवान शिव के परम भक्त गण और अन्य देवता गण वहां पहुंचे और उन्होंने बालक गणेश को महादेव की महिमा समझाते हुए रास्ता छोड़ने का आग्रह किया, परंतु माता की आज्ञा में बंधे गणेश अपनी बात पर अडिग रहे। इस हठ को देखकर शांत स्वभाव वाले महादेव का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया और उन्होंने अंततः अपने अमोघ त्रिशूल से बालक गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया।
जगदम्बा का महाविनाशकारी क्रोध: देवताओं की प्रार्थना पर शिव जी का बड़ा निर्णय
जब माता पार्वती स्नान गृह से बाहर आईं और उन्होंने अपने प्रिय पुत्र को लहुलुहान दशा में मृत देखा, तो वे गहरे शोक और अत्यंत उग्र क्रोध में डूब गईं। आदि शक्ति के इस महाक्रोध ने संपूर्ण सृष्टि और देवलोक को हिलाकर रख दिया और चारों ओर विनाश का संकट मंडराने लगा। इस भयानक परिस्थिति को संभालने के लिए समस्त देवताओं ने व्याकुल होकर भगवान शिव से प्रार्थना की। माता पार्वती के विलाप को देखकर महादेव को भी अपनी त्रुटि का आभास हुआ और उन्होंने बालक को पुनः जीवित करने का दृढ़ संकल्प लिया। शिव जी ने तुरंत अपने गणों को आदेश दिया कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और वहां जो भी पहला जीव सोता हुआ मिले, उसका सिर लेकर आएं।
गजमुख से मिला नया जीवन: प्रथम पूजनीय होने का मिला अमर वरदान
महादेव की आज्ञा पाकर शिवगण उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान कर गए, जहां उन्हें सबसे पहले एक हथिनी का बच्चा (हाथी का शावक) उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोता हुआ मिला। गण नियमानुसार उस हाथी के बच्चे का मस्तक काटकर महादेव के समक्ष ले आए। इसके पश्चात, भगवान शिव ने उस गजमुख को बालक के धड़ से जोड़कर उसमें नए प्राणों का संचार किया और उसे एक नया जीवन प्रदान किया। बालक को पुनर्जीवित करने के साथ ही शिव जी और समस्त देवताओं ने उन्हें ब्रह्मांड में ‘प्रथम पूजनीय’ होने का परम वरदान दिया। तभी से भगवान गणेश ‘गजानन’ कहलाए और हर पूजा में उनकी सबसे पहले वंदना की जाने लगी।

