Jay Vijay Story : सनातन धर्म के पवित्र शास्त्रों और प्राचीन पुराणों में कई ऐसी रहस्यमयी तथा प्रेरणादायक कहानियां मिलती हैं, जो हमें जीवन के गहरे सत्यों से परिचित कराती हैं। इन्हीं में से एक बेहद अद्भुत और कौतूहल जगाने वाली कथा भगवान श्री हरि विष्णु के परम प्रिय और सबसे भरोसेमंद दो द्वारपालों, जय और विजय की है। ये दोनों सेवक न केवल भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे, बल्कि सदैव अत्यंत निष्ठा के साथ वैकुंठ धाम के मुख्य प्रवेश द्वार पर पहरा दिया करते थे।
वैकुंठ की सुरक्षा और अपने प्रभु की सेवा ही उनके जीवन का एकमात्र ध्येय था। परंतु, एक दिन नियति ने ऐसी करवट ली कि उनकी एक छोटी सी भूल के कारण उनका पूरा जीवन हमेशा के लिए बदल गया। अपने इसी एक फैसले की वजह से उन्हें एक ऐसा श्राप मिला, जिसने उन्हें वैकुंठ के दिव्य पार्षदों से सीधे धरती के क्रूर राक्षस योनि में लाकर खड़ा कर दिया। आइए जानते हैं जय और विजय के इस श्राप और उनके तीन जन्मों की पूरी गाथा।
सनत्कुमारों का वैकुंठ आगमन और द्वारपालों द्वारा रोकने की बड़ी भूल
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित बेहद प्रसिद्ध कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहे जाने वाले चार परम ज्ञानी और महान ऋषि—सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार (जिन्हें सामूहिक रूप से सनत्कुमार कहा जाता है)—जगत के पालनहार भगवान नारायण के दर्शन की तीव्र इच्छा लेकर वैकुंठ धाम पहुंचे। ये चारों ऋषि अपनी कठिन तपस्या के बल पर हमेशा पांच वर्ष के बालक के रूप में ही रहते थे और दिगंबर अवस्था में विचरण करते थे। जब वे वैकुंठ के मुख्य द्वार पर पहुंचे, तब वहां पहरा दे रहे द्वारपाल जय और विजय ने उन्हें साधारण बालक समझकर और प्रभु के विश्राम का समय जानकर भीतर प्रवेश करने से रोक दिया। ऋषियों ने उन्हें कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन जय और विजय अपनी बात पर अड़े रहे।
ऋषियों का भयंकर क्रोध और मृत्यु लोक में जन्म लेने का श्राप
क्रोधित ऋषियों का वचन: “जय और विजय का यह अड़ियल व्यवहार और अहंकार ऋषियों को बिल्कुल रास नहीं आया। उन्हें लगा कि भगवान की निकटता पाकर ये दोनों द्वारपाल अपने पद के घमंड में पूरी तरह चूर हो चुके हैं और इनमें शालीनता नहीं बची है।”
इसी वैचारिक मतभेद और अपमान से अत्यंत क्रोधित होकर चारों ऋषियों ने जय और विजय को तत्काल श्राप दे दिया। उन्होंने कहा कि तुम दोनों इस परम पवित्र और दिव्य वैकुंठ धाम में रहने के योग्य नहीं हो, इसलिए तुम्हें इसी क्षण स्वर्गलोक छोड़कर मृत्यु लोक (धरती) पर जाकर जन्म लेना होगा। ऋषियों के मुख से इस भयंकर श्राप को सुनते ही जय और विजय का सारा अहंकार पल भर में हवा हो गया। वे अपनी भूल पर पश्चाताप करते हुए थर-थर कांपने लगे और तुरंत दौड़कर भगवान विष्णु की शरण में जा गिरे। उन्होंने प्रभु से इस श्राप से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई।
भगवान विष्णु की सांत्वना और द्वारपालों के सामने रखे दो विकल्प
अपने द्वारपालों को व्याकुल देखकर भगवान श्री हरि विष्णु वहां प्रकट हुए। उन्होंने ऋषियों का सत्कार किया और जय-विजय से कहा कि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों द्वारा दिया गया श्राप कभी पूरी तरह टाला नहीं जा सकता, इसे भुगतना ही पड़ेगा। परंतु, अपने भक्तों पर दया करते हुए भगवान ने उन्हें इस संकट से निकलने के दो रास्ते बताए। भगवान ने पहला विकल्प यह दिया कि वे दोनों सात जन्मों तक धरती पर साधारण मनुष्य बनकर रहें और निरंतर भगवान की अनन्य भक्ति करके अंत में वैकुंठ वापस लौट आएं। दूसरा विकल्प यह था कि वे केवल तीन जन्मों तक धरती पर भगवान के कड़े शत्रु (राक्षस) के रूप में जन्म लें और स्वयं भगवान के हाथों मृत्यु पाकर अतिशीघ्र वैकुंठ धाम वापस आ जाएं।
तीन जन्मों में राक्षस योनि का अंत और वैकुंठ वापसी का सफर
जय और विजय भगवान विष्णु से सात जन्मों तक दूर रहने का कष्ट सहन नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने जल्दी वापस लौटने के लिए दूसरे विकल्प (तीन जन्म और शत्रु भाव) का चुनाव किया। इसी निर्णय के कारण उन्हें तीन अलग-अलग युगों में भयंकर राक्षस बनकर जन्म लेना पड़ा:
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पहला जन्म (सत्ययुग): अपने पहले जन्म में ये दोनों महाबलशाली राक्षस भाई हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में पैदा हुए। तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी की रक्षा के लिए क्रमशः ‘वराह अवतार’ और ‘नरसिंह अवतार’ धारण कर इन दोनों का संहार किया।
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दूसरा जन्म (त्रेतायुग): दूसरे जन्म में ये दोनों रामायण काल में लंका के राजा रावण और कुंभकर्ण बने। इस युग में भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में अवतार लेकर इन दोनों का वध किया और इन्हें मुक्ति दी।
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तीसरा जन्म (द्वापरयुग): अपने अंतिम जन्म में ये दोनों महाभारत काल में शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से इनका अंत किया।
इस प्रकार, तीन जन्मों तक भगवान से शत्रुता का अभिनय करने के बाद, जय और विजय अंततः ऋषियों के उस भयानक श्राप से पूरी तरह मुक्त हो गए और आदरपूर्वक वापस अपने मूल स्थान वैकुंठ धाम लौट आए।
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