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Caste Census : जाति जनगणना का रास्ता साफ! सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर लगाई फटकार

Caste Census

Caste Census :  देश में होने वाली आगामी जाति आधारित जनगणना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायालय ने उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है जिसमें केंद्र सरकार को जाति आधारित गणना रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। शुक्रवार को हुई इस सुनवाई के दौरान न केवल याचिका को रद किया गया, बल्कि देश की शीर्ष अदालत ने याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा और याचिकाकर्ता के रवैये पर भी कड़ी नाराजगी जाहिर की। इस फैसले के बाद अब 2027 की प्रस्तावित जनगणना का रास्ता साफ होता दिख रहा है।

Caste Census : याचिका की भाषा पर सीजेआई की तीखी नाराजगी और फटकार

सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत याचिकाकर्ता द्वारा जनहित याचिका में इस्तेमाल किए गए शब्दों को लेकर काफी क्रोधित दिखे। व्यक्तिगत रूप से पेश हुए याचिकाकर्ता से सवाल करते हुए सीजेआई ने पूछा कि उन्होंने यह याचिका किससे लिखवाई है। पीठ ने टिप्पणी की कि याचिका की भाषा ‘बदतमीजी’ भरी और अमर्यादित है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कड़े लहजे में कहा, “आप ऐसी भाषा कहां से लाते हैं? एक कानूनी जानकारी रखने वाले व्यक्ति से इस तरह के शब्दों की अपेक्षा नहीं की जा सकती।” प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे, जिन्होंने एकमत होकर इस याचिका को खारिज कर दिया।

Caste Census : एकल संतान नीति और जनगणना पर अन्य मांगों को भी किया अस्वीकार

इस जनहित याचिका में केवल जाति आधारित जनगणना को रोकने की ही मांग नहीं थी, बल्कि याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया था कि ‘एकल संतान’ (Single Child) वाले परिवारों को आर्थिक प्रोत्साहन देने के लिए विशेष नीतियां बनाई जाएं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इन मांगों पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीतियों का निर्माण करना और जनगणना की प्रक्रिया तय करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसके लिए उचित कानूनी व संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए।

2027 की जनगणना: डिजिटल और जातिगत आंकड़ों पर आधारित ऐतिहासिक कदम

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी 2 फरवरी को एक अन्य याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें जातिगत आंकड़ों के वर्गीकरण और सत्यापन की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, देश की आगामी 16वीं राष्ट्रीय जनगणना वर्ष 2027 में प्रस्तावित है। यह जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक होने वाली है। 1931 के बाद यह पहली ऐसी व्यापक गणना होगी जिसमें जाति के आधार पर आंकड़े जुटाए जाएंगे। साथ ही, यह भारत की पहली ‘पूर्ण डिजिटल जनगणना’ (Fully Digital Census) होगी, जिससे डेटा संग्रहण और विश्लेषण में अधिक सटीकता आने की उम्मीद है।

अदालत आने से पहले अधिकारियों से संपर्क करने की सीजेआई की सलाह

सुनवाई के अंत में सीजेआई ने याचिकाकर्ता को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने कहा कि सीधे अदालत का रुख करने के बजाय याचिकाकर्ता को संबंधित अधिकारियों और विभाग से संपर्क करना चाहिए था। सीजेआई ने जोर देकर कहा कि बार के एक सदस्य और कानून के जानकार के रूप में, व्यक्ति को किसी भी मुद्दे को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। उन्होंने कहा, “आपको पहले अधिकारियों को जागरूक करने की कोशिश करनी चाहिए और जब वहां से कोई समाधान न निकले, तब न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए।” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिकाओं का उपयोग नीतिगत मामलों में बिना ठोस आधार के हस्तक्षेप के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष और आगामी परिदृश्य

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से यह संदेश गया है कि जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के प्रशासनिक कार्यों में बिना किसी ठोस कानूनी आधार के हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। याचिका खारिज होने से केंद्र सरकार को अपनी प्रस्तावित योजनाओं को आगे बढ़ाने का बल मिला है। अब सबकी नजरें 2027 की डिजिटल जनगणना पर टिकी हैं, जो देश के सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को समझने के लिए नए आंकड़े पेश करेगी।

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