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Yogi Adityanath Story : कॉलेज के दिनों में चोरी हो गई थी योगी की मार्कशीट, फिर कैसे बदले जीवन के रास्ते?

Yogi Adityanath Story

Yogi Adityanath Story : उत्तर प्रदेश के यशस्वी मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता योगी आदित्यनाथ आज (5 जून 2026) अपना 54वां जन्मदिन मना रहे हैं। वर्तमान दौर में योगी आदित्यनाथ को भारत के सबसे मुखर, प्रभावशाली और लोकप्रिय हिंदूवादी नेताओं में अग्रिम पंक्ति में गिना जाता है। हालांकि, उनके जीवन का एक ऐसा कालखंड भी रहा है जब उन्हें सक्रिय राजनीति में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं थी।

वे उत्तराखंड के एक बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले और कॉलेज में अपनी धुन में रहने वाले आम छात्र थे। उस समय उनके दूर-दूर के सपनों में भी किसी राज्य का मुख्यमंत्री बनना शामिल नहीं था। लेकिन, नियति ने उनके लिए कुछ और ही अनूठा मार्ग तय कर रखा था। जीवन में घटी कुछ अप्रत्याशित घटनाओं और एक सामाजिक लड़ाई के बाद उन्होंने न सिर्फ घर-बार छोड़कर संन्यास की राह चुनी, बल्कि देश की सबसे बड़ी सियासत के शीर्ष पुरुष बनकर उभरे।

विज्ञान की मार्कशीट चोरी होने की वह रहस्यमयी घटना, जिसने अजय सिंह बिष्ट को बनाया संन्यासी

योगी आदित्यनाथ का जन्म 5 जून 1972 को उत्तराखंड (जो उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) के सुदूर पौड़ी गढ़वाल स्थित पंचूर गांव में हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम अजय सिंह बिष्ट रखा था। अजय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और उनका मन पढ़ाई-लिखाई में बहुत अच्छे से रमता था। उन्होंने उत्तराखंड की प्रतिष्ठित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी (HNBGU) से विज्ञान संकाय में अपनी बी.एससी. (B.Sc.) की डिग्री पूरी की थी। लोक मान्यताओं और उनके करीबियों के अनुसार, बी.एससी. करने के बाद वे ऋषिकेश से विज्ञान में ही स्नातकोत्तर यानी एम.एससी. (M.Sc.) की उच्च शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे।

इसी दौरान जब वे कोटद्वार में थे, तो वहां से उनकी विज्ञान की मूल मार्कशीट और जरूरी शैक्षणिक सर्टिफिकेट्स रहस्यमयी तरीके से चोरी हो गए। अजय ने उन प्रमाण पत्रों को दोबारा बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे और बहुत कोशिश की, लेकिन बात नहीं बन सकी। इसी हताशा के बीच उनका ध्यान देश में चल रहे ऐतिहासिक राम मंदिर आंदोलन की तरफ आकर्षित हुआ।

इसी दौरान वे गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए। इस मुलाकात ने उनके अंतर्मन को ऐसा बदला कि उन्होंने भौतिक संसार को त्यागकर संन्यास धारण करने का कठोर निर्णय ले लिया। अगर उस समय उनकी मार्कशीट चोरी न हुई होती, तो शायद वे आज किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर या वैज्ञानिक के रूप में शोध कर रहे होते, लेकिन किस्मत उन्हें गोरखपुर खींच लाई।

बिना बताए घर से हुए लापता; जब संन्यासी बेटे को वापस लेने गोरखपुर पहुंचे बेबस पिता

जब अजय सिंह बिष्ट ने अपने जीवन को पूरी तरह से वैराग्य के रंग में ढालने और संन्यास लेने का अंतिम फैसला किया, तो उन्होंने अपने इस बड़े कदम की भनक अपने परिवार के किसी भी सदस्य को नहीं लगने दी। वे एक दिन अचानक बिना बताए अपने घर से चुपचाप निकल गए और सीधे गोरखपुर आ गए। कई महीनों तक उनके माता-पिता और भाई-बहनों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि उनका बेटा सकुशल है भी या नहीं और वह कहां रह रहा है। काफी खोजबीन के बाद जब उनके पिता आनंद सिंह बिष्ट को यह मालूम हुआ कि उनका बेटा अब गोरखनाथ मंदिर का हिस्सा बन चुका है और उसने दीक्षा ले ली है, तो वे उसे वापस घर ले जाने की उम्मीद के साथ गोरखपुर पहुंचे।

गोरखनाथ मंदिर में जब पिता ने अपने लाडले बेटे को गेरुआ वस्त्रों में पूरी तरह संन्यास धर्म के नियमों में ढला हुआ देखा, तो उनका दिल भर आया। पिता ने उन्हें वापस चलने की काफी मनुहार की, लेकिन अजय के दृढ़ निश्चय को देखकर वे भारी मन से अकेले ही उत्तराखंड लौट गए। कहा जाता है कि इस भावुक मुलाकात के दौरान आनंद सिंह बिष्ट की बातचीत तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ से भी हुई थी। तब महंत अवैद्यनाथ ने पिता को सांत्वना देते हुए एक ऐतिहासिक वाक्य कहा था कि “आनंद सिंह जी, दुखी मत होइए, आपका बेटा अब सिर्फ आपका नहीं रहा, बल्कि उसने पूरे समाज और राष्ट्र की सेवा के लिए जन्म लिया है, अब यह पूरे समाज का बेटा है।”

गोरखपुर के कॉलेज विवाद की एक छोटी सी लड़ाई और राजनीति में हुआ योगी का पदार्पण

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में संन्यास की दीक्षा लेने के बाद योगी आदित्यनाथ ने पूरी लगन के साथ लोक कल्याण और सामाजिक उत्थान के कार्यों में खुद को झोंक दिया। इस दौरान वे स्थानीय जनता की समस्याओं और भ्रष्टाचार के विभिन्न मुद्दों को लेकर अक्सर जिला प्रशासन के खिलाफ उग्र प्रदर्शन करने से भी पीछे नहीं हटते थे। उनके सार्वजनिक जीवन में आने और राजनीति की तरफ मुड़ने का एक दिलचस्प वाकया बहुत मशहूर है।

गोरखपुर के एक नामी इंटर कॉलेज के कुछ छात्र बाजार में कपड़े खरीदने के लिए एक दुकान पर गए थे। वहां किसी बात को लेकर छात्रों और दुकानदार के बीच विवाद काफी बढ़ गया। विवाद के दौरान जब दुकानदार पर कथित हमला हुआ, तो उसने आत्मरक्षा या डराने के उद्देश्य से अपनी लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाल ली। इस घटना के दो दिन बाद, न्याय की मांग को लेकर एक युवा और ओजस्वी योगी के नेतृत्व में सैकड़ों छात्रों ने उस दुकानदार के खिलाफ कार्रवाई के लिए शहर में एक बेहद उग्र और विशाल प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन करते हुए युवा योगी और छात्र तत्कालीन एसएसपी (SSP) आवास की ऊंची दीवार पर भी चढ़ गए थे। इस उग्र आंदोलन के कारण योगी आदित्यनाथ को पहली बार जेल की सलाखों के पीछे भी जाना पड़ा। इसी घटना के बाद उन्हें अहसास हुआ कि व्यवस्था को सुधारने और समाज को न्याय दिलाने के लिए राजनीति की शक्ति का होना बेहद जरूरी है, जिसके बाद उन्होंने विधिवत रूप से राजनीति में कदम रखा।

महज 26 साल की उम्र में देश के सबसे युवा सांसद बनकर पहुंचे देश की संसद (लोकसभा)

योगी आदित्यनाथ की सांगठनिक क्षमता और जनता के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ ने साल 1994 में ही उन्हें आधिकारिक रूप से गोरखनाथ पीठ का अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि, वे पूर्ण रूप से गोरख पीठ के महंत साल 2014 में पूज्य अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद बने। उत्तराधिकारी घोषित होने के बाद योगी लगातार चौबीसों घंटे पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) की जनता के बीच रहकर उनके सुख-दुख में भागीदार बनने लगे।

उनकी इसी भारी लोकप्रियता को देखते हुए साल 1998 के आम चुनाव में उन्हें गोरखपुर लोकसभा सीट से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया। योगी आदित्यनाथ ने इस चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी को करारी शिकस्त देते हुए शानदार जीत दर्ज की और महज 26 वर्ष की अविश्वसनीय उम्र में 12वीं लोकसभा के सबसे युवा सांसद बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद पूर्वांचल की राजनीति में उनकी ऐसी मजबूत पकड़ बनी कि वे लगातार पांच बार (साल 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014) इसी संसदीय सीट से रिकॉर्ड मतों से जीतकर देश की संसद पहुंचते रहे।

साल 2007 का वह भावुक दौर, जब लोकसभा में अपनी व्यथा सुनाते हुए फूट-फूटकर रो पड़े थे सख्त योगी

आमतौर पर योगी आदित्यनाथ को देश की राजनीति में एक बेहद सख्त, अडिग, निडर और समझौता न करने वाले नेता के रूप में देखा और जाना जाता है। लेकिन साल 2007 में पूरे देश ने संसद के भीतर उनका एक ऐसा भावुक और संवेदनशील रूप देखा था, जिसने हर किसी को स्तब्ध कर दिया था। दरअसल, उस समय गोरखपुर में भड़के एक सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक उठापटक के बाद तत्कालीन राज्य सरकार के इशारे पर योगी आदित्यनाथ को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। इस राजनीतिक द्वेष के चलते उन्हें करीब 11 दिनों तक जेल की कालकोठरी में एकांतवास में रहना पड़ा था।

जब वे जमानत पर जेल से छूटकर वापस देश की संसद (लोकसभा) पहुंचे, तो सदन की कार्यवाही के दौरान अपनी बात रखते हुए वे देश के सामने अपने आंसू नहीं रोक पाए और सदन में ही फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने अत्यंत भारी मन से तत्कालीन उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार पर तीखा आरोप लगाते हुए कहा था कि उनके खिलाफ एक बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश रची जा रही है और उन्हें वैचारिक रूप से कुचलने के लिए जेल में जानबूझकर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

योगी को इस तरह रोता देख उस समय सदन के माननीय अध्यक्ष (स्पीकर) सोमनाथ चटर्जी का दिल भी पसीज गया और उन्होंने योगी को सांत्वना देते हुए ढाढ़स बंधाया था। यह दौर उनके राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन और अग्निपरीक्षा वाले दौर में से एक माना जाता है।

‘हिंदू युवा वाहिनी’ का अभूतपूर्व गठन और टिकट बंटवारे को लेकर बीजेपी आलाकमान से ऐतिहासिक टकराव

योगी आदित्यनाथ हमेशा से ही देश की राजनीति में अपनी खास शर्तों और देशहित के सिद्धांतों पर अड़कर राजनीति करने के लिए जाने जाते रहे हैं। साल 2002 के आसपास का वह दौर था, जब उन्हें महसूस हुआ कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व पूर्वांचल के स्थानीय मुद्दों और राष्ट्रवाद की भावना को लेकर उनके मुताबिक कड़े फैसले नहीं ले पा रहा है। इस वैचारिक मतभेद के बाद उन्होंने पारंपरिक राजनीति से इतर अपनी एक अलग सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था का गठन किया, जिसका नाम रखा गया ‘हिंदू युवा वाहिनी’।

इस जमीनी संगठन के युवाओं के दम पर पूरे पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक और सामाजिक सिक्का इस कदर जम गया कि एक समय पर खुद भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय आलाकमान को भी गोरखपुर और उसके आसपास के दर्जनों जिलों में विधानसभा या लोकसभा चुनाव के टिकट बांटने से पहले योगी आदित्यनाथ की लिखित सहमति और हरी झंडी लेनी पड़ती थी। कूटनीतिक तल्खी इतनी ज्यादा थी कि कई बार अपनी बात न माने जाने पर योगी आदित्यनाथ के समर्थकों ने बीजेपी के आधिकारिक उम्मीदवारों के सामने हिंदू युवा वाहिनी के अपने स्वतंत्र प्रत्याशी तक चुनावी मैदान में उतार दिए थे और उन्हें जितवाकर अपनी ताकत का लोहा मनवाया था।

साल 2017 का वह चमत्कारी मोड़, जब अचानक बदला चार्टर्ड प्लेन का रूट और मिला यूपी का ताज

साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने किसी भी नेता को मुख्यमंत्री (CM) का चेहरा घोषित नहीं किया था और पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा गया था। जब चुनाव के ऐतिहासिक नतीजे आए और बीजेपी को राज्य में तीन-चौथाई से भी ज्यादा का प्रचंड बहुमत मिला, तो दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बैठकों का दौर शुरू हो गया। उस समय अमित शाह और पीएम मोदी के बीच लंबी चर्चाएं चल रही थीं और मीडिया में कई केंद्रीय मंत्रियों व कद्दावर नेताओं के नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे थे।

उस समय योगी आदित्यनाथ गोरखपुर में अपने सामान्य कार्यों में व्यस्त थे। तभी अचानक उनके पास दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व का एक अत्यंत गोपनीय फोन आया और उन्हें बिना एक पल गंवाए तुरंत लखनऊ से विशेष चार्टर्ड प्लेन द्वारा दिल्ली बुलाया गया। राजनीतिक पंडितों द्वारा कयास लगाए जा रहे थे कि शायद उन्हें केंद्र सरकार में कोई बहुत बड़ा मंत्रालय या कैबिनेट पद सौंपने की तैयारी है। लेकिन जब वे दिल्ली पहुंचे, तो शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें सीधे उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य की कमान संभालने का ऐतिहासिक आदेश दे दिया।

जब वे मनोनीत मुख्यमंत्री के रूप में लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस पहुंचे, तो खुद बीजेपी के कई स्थापित और बड़े नेता भी पूरी तरह हैरान रह गए थे क्योंकि मुख्यमंत्री पद की रेस की शुरुआती सूचियों में दूर-दूर तक उनका नाम शामिल नहीं था। इस तरह योगी आदित्यनाथ ने देश की राजनीति का एक नया इतिहास लिख दिया। वे साल 2017 से लगातार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर पूरी मजबूती से काबिज हैं, और अब आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी उनके ही सशक्त चेहरे और ‘सुशासन व बुल्डोजर मॉडल’ के दम पर चुनाव मैदान में उतरने की पूरी तैयारी कर रही है।

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