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Iran-US Ceasefire Controversy: शहबाज शरीफ के दावे पर विवाद, क्या लेबनान में जारी रहेगा युद्ध?

Iran-US Ceasefire Controversy

Iran-US Ceasefire Controversy:  ईरान और अमेरिका के बीच कथित सीजफायर समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नया भूचाल आ गया है। इस विवाद के केंद्र में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का वह बयान है, जिसमें उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता का दावा किया था। बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा युद्धविराम की घोषणा के बाद, शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट साझा की। उन्होंने दावा किया कि ईरान, अमेरिका और लेबनान समेत सभी सहयोगी देश दो सप्ताह के लिए हमलों को रोकने और वार्ता की मेज पर आने के लिए सहमत हो गए हैं। हालांकि, इस दावे ने शांति के बजाय एक नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।

Iran-US Ceasefire Controversy:  व्हाइट हाउस का पलटवार: लेबनान समझौते का हिस्सा नहीं

शहबाज शरीफ के दावों की हवा तब निकल गई जब अमेरिकी व्हाइट हाउस ने आधिकारिक तौर पर इस बयान को खारिज कर दिया। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि लेबनान कभी भी इस दो सप्ताह के सीजफायर समझौते का हिस्सा नहीं था। अमेरिका का कहना है कि समझौते की शर्तें सभी पक्षों को पहले ही स्पष्ट कर दी गई थीं। इस स्पष्टीकरण के बाद पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहबाज शरीफ की किरकिरी हो रही है।

Iran-US Ceasefire Controversy:  लेबनान में जारी हिंसा: ईरान ने बंद किया होरमुज जलडमरूमध्य

हकीकत यह है कि युद्धविराम की घोषणा के बावजूद इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले बंद नहीं किए। इसके विरोध में ईरान ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ होरमुज’ को फिर से बंद कर दिया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए जीवन रेखा माना जाता है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने शहबाज शरीफ की पोस्ट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए अमेरिका पर दबाव बनाया। उन्होंने हाईलाइट किया कि यदि लेबनान में हमले जारी रहते हैं, तो सीजफायर की शर्तों का कोई अर्थ नहीं रह जाता। अराघची ने दो टूक कहा कि अमेरिका को चुनना होगा कि वह वास्तव में शांति चाहता है या इजरायल के माध्यम से युद्ध जारी रखना चाहता है।

इजरायल का सख्त रुख: नेतन्याहू ने दावों को नकारा

इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी स्थिति साफ करते हुए कहा कि ईरान के साथ हुआ समझौता लेबनान पर लागू नहीं होता। उन्होंने अपने संबोधन में हिजबुल्लाह पर किए गए पेजर हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान को पहले ही बड़ा झटका दिया जा चुका है। इजरायल और अमेरिका के इस समन्वित रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लेबनान के मोर्चे पर फिलहाल कोई राहत मिलने वाली नहीं है, जिससे ईरान के भीतर भारी रोष व्याप्त है।

ईरानी संसद की चेतावनी: तीन बड़े उल्लंघनों का दावा

ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने इस पूरे घटनाक्रम को अमेरिका के प्रति ऐतिहासिक अविश्वास का एक और उदाहरण बताया है। उन्होंने कहा कि औपचारिक बातचीत शुरू होने से पहले ही दस प्रस्तावों में से तीन प्रमुख बिंदुओं का उल्लंघन किया जा चुका है। गालिबाफ के अनुसार, पहला उल्लंघन लेबनान में सीजफायर न करना है। दूसरा, ईरान के भीतर ड्रोन हमले की कोशिश की गई और तीसरा, अमेरिका ने ईरान के यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) के अधिकार को मानने से इनकार कर दिया। गालिबाफ ने चेतावनी दी कि इन परिस्थितियों में द्विपक्षीय बातचीत का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है।

भविष्य की अनिश्चितता: क्या पाकिस्तान ने किया गुमराह?

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जानबूझकर गलत जानकारी साझा की थी या वे स्वयं गलतफहमी का शिकार हुए? यदि लेबनान समझौते का हिस्सा नहीं था, तो शहबाज शरीफ ने इसका जिक्र क्यों किया? दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने अंतिम समय में समझौते की शर्तों में बदलाव किया। जो भी हो, इस विवाद ने पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों को एक बार फिर धुंधला कर दिया है और भविष्य की वार्ताओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

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