Shani Jayanti 2026: सनातन धर्म में शनि देव को न्याय और कर्मों का फल देने वाला देवता माना गया है, जो मनुष्य को उसके अच्छे-बुरे कर्मों के आधार पर भाग्य तय करते हैं। इन कर्मफलदाता शनि देव को प्रसन्न करने और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को सबसे उत्तम और बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के पावन दिन ही सूर्य पुत्र शनि देव का अवतरण हुआ था, इसलिए इस दिन को ‘शनि जयंती’ या ‘शनि अमावस्या’ के रूप में पूरे देश में बड़े ही श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। इस साल यह पावन पर्व 16 मई को मनाया जाएगा, जिस दिन शनि देव को तेल अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और कष्ट दूर होते हैं।
शनि देव को तेल चढ़ाते समय भूलकर भी न करें ये 5 बड़ी गलतियां
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि जयंती के शुभ अवसर पर शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाने से कुंडली में मौजूद शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या जैसी भारी महादशाओं का अशुभ प्रभाव काफी हद तक कम हो जाता है। हालांकि, तेल चढ़ाते समय कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
सबसे पहला नियम यह है कि तेल अर्पित करते समय भक्त को कभी भी शनि देव की मूर्ति की आंखों में सीधे नहीं देखना चाहिए, बल्कि अपनी नजरें हमेशा उनके चरणों की ओर रखनी चाहिए। दूसरा, भगवान पर हमेशा शुद्ध और साफ सरसों का तेल ही चढ़ाएं, किसी भी तरह का मिलावटी या पहले से इस्तेमाल किया हुआ तेल चढ़ाने से पूजा निष्फल हो जाती है।
पूजा के दौरान दिशा, वस्त्र और बर्तनों के चयन में बरतें पूरी सावधानी
इसके अलावा, शनि जयंती के दिन हमेशा पूरी तरह से स्नान करके साफ-सुथरे कपड़े पहनकर ही तेल अर्पित करना चाहिए। इस दिन गहरे नीले या काले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करना सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है। चौथा नियम यह है कि भक्त को कभी भी शनि देव की प्रतिमा के बिल्कुल सामने खड़े होकर जल या तेल अर्पित नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा मूर्ति के दाईं या बाईं ओर खड़े होकर ही पूजा संपन्न करनी चाहिए।
पांचवां और सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि तेल चढ़ाने के लिए कभी भी तांबे के बर्तन या लोटे का भूलकर भी उपयोग न करें, क्योंकि तांबा सूर्य की धातु है और शनि-सूर्य में शत्रुता है। इसके बजाय लोहे या मिट्टी के पात्र का उपयोग करें, जिसमें लोहा शनि देव की प्रिय धातु होने के कारण सर्वोत्तम है।
शनि जयंती के दिन इस विशेष और प्रामाणिक विधि से संपन्न करें पूजा
शनि जयंती के पावन दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय से पहले उठकर घर की साफ-सफाई करें और स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर में शनि देव का ध्यान करते हुए उनके मंत्रों का श्रद्धापूर्वक जाप और आरती करें। फिर शाम के समय किसी नजदीकी शनि मंदिर में जाकर लोहे के पात्र से शनि देव को सरसों का तेल अर्पित करें और तेल चढ़ाते समय ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का निरंतर मन ही मन जाप करते रहें। इसके साथ ही, इस दिन शनि देव के चालीसा का पाठ करना भी भक्तों के लिए बेहद कल्याणकारी सिद्ध होता है।
शनि दोषों से मुक्ति के लिए अवश्य करें ‘छाया दान’ और पीपल पूजा
शनि अमावस्या के दिन कष्टों से मुक्ति पाने के लिए ‘छाया दान’ करने का विशेष विधान है। इसके लिए एक कटोरी में शुद्ध सरसों का तेल लें और उसमें श्रद्धापूर्वक अपना चेहरा देखें, फिर उस तेल को मंदिर में रख दें या किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान कर दें।
इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार किसी गरीब व्यक्ति को काला चना, काला छाता, ऊनी कंबल या लोहे के बर्तनों का दान करें। शाम के समय किसी पुराने पीपल के पेड़ के नीचे जाकर सरसों के तेल का एक दीपक अवश्य जलाएं। ऐसा करने से न केवल शनि देव प्रसन्न होते हैं, बल्कि जातक को अपने पितरों का भी विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
जानिए शनि जयंती पर तेल चढ़ाने का सबसे उत्तम और शुभ समय
शास्त्रों के अनुसार, शनि देव की पूजा और उन्हें तेल अर्पित करने के लिए समय का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी माना गया है। शनि जयंती के दिन शाम को सूर्यास्त होने के बाद से लेकर रात को 8 बजे तक का समय शनि देव की आराधना और तेल चढ़ाने के लिए सबसे उपयुक्त और सर्वोत्तम माना जाता है।
इस अवधि में की गई पूजा का फल शीघ्र प्राप्त होता है। तेल चढ़ाते समय हमेशा लोहे के छोटे पात्र या कटोरी का ही इस्तेमाल करें ताकि शनि देव की कृपा आप पर और आपके पूरे परिवार पर बनी रहे और जीवन के सभी कूटनीतिक व आर्थिक संकट हमेशा के लिए समाप्त हो जाएं।
