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Geneva Nuclear Summit: जेनेवा में परमाणु महाशक्तियों की महाबैठक, अमेरिका, रूस और चीन के बीच शस्त्र नियंत्रण पर चर्चा

Geneva Nuclear Summit: दुनिया को परमाणु युद्ध के साये से बचाने और हथियारों की होड़ पर लगाम लगाने के लिए स्विट्जरलैंड का जेनेवा शहर एक बार फिर ऐतिहासिक वार्ता का गवाह बन रहा है। फ्रांस प्रेस एजेंसी (AFP) की रिपोर्ट के अनुसार, सोमवार (23 फरवरी 2026) को अमेरिका, रूस और चीन के प्रतिनिधियों के बीच परमाणु शस्त्र नियंत्रण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक शुरू हुई। यह वार्ता ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों की तैनाती को सीमित करने वाला अंतिम प्रमुख समझौता ‘न्यू स्टार्ट’ (New START) आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है। इस समझौते के खत्म होने से वैश्विक सुरक्षा पर खड़े हुए सवालों के बीच वाशिंगटन अब एक नई और अधिक व्यापक संधि की रूपरेखा तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

Geneva Nuclear Summit: वार्ता का दौर: रूसी और चीनी प्रतिनिधिमंडलों के साथ अमेरिकी संवाद

अमेरिकी विदेश विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस कूटनीतिक मिशन की पुष्टि करते हुए बताया कि सोमवार को अमेरिकी दल ने रूसी प्रतिनिधिमंडल के साथ गहन चर्चा की। इसी क्रम में, 24 फरवरी को चीन के प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक निर्धारित की गई है। अधिकारी के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में ‘न्यू स्टार्ट’ संधि के निष्प्रभावी होने के बाद वाशिंगटन में प्रारंभिक दौर की बातचीत हुई थी, लेकिन जेनेवा में हो रही ये बैठकें अधिक गंभीर, विस्तारपूर्ण और तकनीकी पहलुओं पर केंद्रित हैं। अमेरिका केवल रूस और चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने हाल के दिनों में अपने सहयोगियों—यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस—के साथ भी सुरक्षा चिंताओं पर कई दौर का संवाद किया है।

Geneva Nuclear Summit: न्यू स्टार्ट समझौते का अंत: क्यों बढ़ा परमाणु हथियारों का खतरा?

‘न्यू स्टार्ट’ संधि अमेरिका और रूस के बीच वह आखिरी कानूनी सुरक्षा कवच था, जो दोनों देशों को एक निश्चित संख्या से अधिक परमाणु हथियार तैनात करने से रोकता था। 5 फरवरी को इस संधि की अवधि समाप्त होने के बाद अब दोनों महाशक्तियों पर कोई तकनीकी पाबंदी नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक ऐसी नई त्रिपक्षीय संधि (Trilateral Treaty) पर जोर दे रहे हैं, जिसमें रूस के साथ-साथ चीन को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। अमेरिका का तर्क है कि चीन के पास वर्तमान में भले ही कम हथियार हों, लेकिन जिस गति से बीजिंग अपना परमाणु जखीरा बढ़ा रहा है, उसे नियंत्रित करना वैश्विक शांति के लिए अनिवार्य है।

चीन का रुख: परमाणु दौड़ से इनकार और संधि पर असहमति

ट्रंप की मांगों के विपरीत, चीन ने इस त्रिपक्षीय समझौते में शामिल होने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया है। जेनेवा में चीनी राजदूत शेन जियान ने बीजिंग का पक्ष रखते हुए कहा कि चीन किसी भी देश के साथ परमाणु हथियारों की अंधी दौड़ में शामिल होने का इरादा नहीं रखता। उनका तर्क है कि चीन के हथियारों की संख्या अमेरिका और रूस के विशाल भंडार की तुलना में बेहद मामूली है, इसलिए चीन को इन वार्ताओं में एक समान पक्षकार के रूप में देखना व्यावहारिक नहीं है। वहीं, अमेरिकी अधिकारी क्रिस्टोफर यी ने न्यू स्टार्ट समझौते की कमियों को गिनाते हुए कहा कि पुरानी संधि में चीन के बढ़ते परमाणु प्रभाव का सही आकलन नहीं किया गया था, जिसे अब सुधारा जाना आवश्यक है।

हथियार नियंत्रण का भविष्य: पी-5 देशों के बीच साझा सहमति की तलाश

राष्ट्रपति ट्रंप का लक्ष्य अब द्विपक्षीय वार्ताओं से आगे बढ़कर बहुपक्षीय शस्त्र नियंत्रण (Multilateral Arms Control) को बढ़ावा देना है। अमेरिकी प्रशासन की योजना है कि इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों (P5)—अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस—के मंच पर लाया जाए। वाशिंगटन का मानना है कि परमाणु हथियारों को कम करने के लिए केवल दो देशों के बीच की संधि अब पर्याप्त नहीं है। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि वह बातचीत के किसी एक तरीके तक सीमित नहीं रहेगा; चाहे वह दो देशों के बीच हो या समूहों के बीच, मुख्य उद्देश्य दुनिया को परमाणु मुक्त या कम से कम नियंत्रित बनाना है।

विश्व शांति की उम्मीद: क्या निकलेगा जेनेवा वार्ता का निष्कर्ष?

जेनेवा में चल रही ये बैठकें आने वाले दशकों के लिए वैश्विक सुरक्षा की दिशा तय करेंगी। यदि अमेरिका, रूस और चीन किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर सहमत हो जाते हैं, तो यह तीसरे विश्व युद्ध के खतरे को टालने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर होगा। हालांकि, देशों के बीच गहरे अविश्वास और सामरिक हितों के टकराव को देखते हुए, एक नई ‘ग्रैंड ट्रीटी’ तक पहुँचना फिलहाल एक कठिन चुनौती नजर आता है। पूरी दुनिया की नजरें अब इन परमाणु महाशक्तियों के अगले कदम पर टिकी हैं।

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