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FCRA Row: अमेरिका की टिप्पणी पर भारत का सख्त जवाब, कहा- यह हमारा आंतरिक मामला

FCRA Row

FCRA Row: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA संशोधन विधेयक-2026 को लेकर अमेरिकी सांसद राइली मूर की टिप्पणी पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि FCRA से जुड़े सभी विधायी फैसले भारत का आंतरिक मामला हैं और इस पर निर्णय लेने का अधिकार केवल भारतीय संसद को है। मंत्रालय ने कहा कि किसी अन्य देश की ओर से इस विषय पर टिप्पणी करना उचित नहीं है, क्योंकि यह भारत की संप्रभु विधायी प्रक्रिया से जुड़ा विषय है।

विदेश मंत्रालय ने अमेरिका को दिलाई उसकी अपनी व्यवस्था की याद

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणियों पर ध्यान दिया है। उन्होंने कहा कि विदेशी फंड के नियमन से जुड़े कानून केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका समेत कई अन्य देशों में भी लागू हैं। ऐसे में भारत द्वारा विदेशी चंदे के उपयोग और निगरानी के लिए बनाए जा रहे नियमों पर सवाल उठाना उचित नहीं माना जा सकता।रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत की संसद देशहित में कानून बनाती है और FCRA संशोधन भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। उन्होंने दोहराया कि यह पूरी तरह भारत का आंतरिक विषय है।

क्या बोले थे अमेरिकी सांसद राइली मूर?

अमेरिकी सांसद राइली मूर ने भारतीय संसद में प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक-2026 पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने दावा किया कि यह संशोधन भारत के ईसाई समुदाय और चर्चों के खिलाफ हो सकता है। मूर ने कहा कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है तो यह भारत-अमेरिका संबंधों में चिंता का विषय बन सकता है।सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किए गए अपने संदेश में उन्होंने कहा कि भारत में ईसाई समुदाय का इतिहास बहुत पुराना है और सरकार द्वारा चर्चों तथा धार्मिक संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश चिंता पैदा करती है।

सेंट थॉमस का भी किया उल्लेख

राइली मूर ने अपने पोस्ट में कहा कि ईसा मसीह के पुनरुत्थान के कुछ दशकों बाद ही सेंट थॉमस भारत के मालाबार तट पहुंचे थे और तब से ईसाई समुदाय भारत का हिस्सा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन धार्मिक चैरिटी संस्थाओं और चर्चों की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।हालांकि भारत सरकार की ओर से इस दावे पर कोई अलग टिप्पणी नहीं की गई, लेकिन विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि विधायी प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और देश के कानूनों के अनुरूप चल रही है।

कैथोलिक एरीना ने भी जताई चिंता

इस विवाद में कैथोलिक एरीना नामक संगठन ने भी प्रतिक्रिया दी। संगठन ने अमेरिकी सांसद राइली मूर का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया और कहा कि भारत में ईसाई समुदाय कई चुनौतियों का सामना कर रहा है।संगठन ने यूरोपीय यूनियन और अन्य देशों से भी इस मुद्दे पर ध्यान देने की अपील की और कहा कि व्यापारिक समझौतों के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता के सवालों पर भी चर्चा होनी चाहिए।

क्या हैं प्रस्तावित FCRA संशोधन के प्रमुख प्रावधान?

केंद्र सरकार मानसून सत्र के दौरान FCRA संशोधन विधेयक-2026 को संसद से पारित कराने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित संशोधनों के तहत यदि किसी संस्था का पंजीकरण समाप्त हो जाता है या रद्द कर दिया जाता है, तो उसके विदेशी फंड की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था की जाएगी।इसके अलावा नए नियमों में विदेशी चंदा प्राप्त करने वाली संस्थाओं के पंजीकरण को निर्धारित उद्देश्यों और स्वीकृत राज्यों से जोड़ा गया है। सरकार ने धार्मिक गतिविधियों से जुड़े प्रावधानों में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए जाने वाले प्रचार-प्रसार को अनुमत गतिविधियों की सूची से बाहर रखने की बात कही गई है।

FCRA कानून का उद्देश्य क्या है?

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA की शुरुआत वर्ष 1976 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य विदेशी स्रोतों से मिलने वाले आर्थिक सहयोग को पारदर्शी तरीके से नियंत्रित करना और उसके उपयोग की निगरानी करना है।बाद में वर्ष 2010 में नया FCRA कानून लागू किया गया, जिसमें समय-समय पर 2016, 2018, 2020 और अब 2026 में संशोधन प्रस्तावित किए गए। यह कानून सुनिश्चित करता है कि विदेशी चंदे का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए ही किया जाए और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप उसकी निगरानी हो।

भारत ने दोहराया अपना स्पष्ट रुख

पूरे विवाद के बीच भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि FCRA संशोधन से जुड़ा हर निर्णय संसद की विधायी प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि विदेशी फंड के नियमन को लेकर भारत का दृष्टिकोण वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप है और इस विषय पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। अब सभी की नजर संसद में प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक पर होने वाली चर्चा और उसके अंतिम स्वरूप पर टिकी हुई है।

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