Congress TVK Alliance : तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। दशकों पुराने अपने सहयोगी डीएमके (DMK) का साथ छोड़ते हुए कांग्रेस ने अब अभिनेता से नेता बने विजय की नवनिर्मित पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) को समर्थन देने का औपचारिक ऐलान कर दिया है। कांग्रेस ने इस गठबंधन के लिए एक महत्वपूर्ण वैचारिक शर्त भी रखी है। पार्टी के अनुसार, टीवीके के साथ उनका जुड़ाव इस आधार पर होगा कि गठबंधन से उन सभी सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह बाहर रखा जाए जो भारत के संविधान में विश्वास नहीं रखतीं।
कांग्रेस ने साफ किया है कि यह केवल तात्कालिक सहयोग नहीं है, बल्कि आगामी स्थानीय निकायों के चुनाव से लेकर लोकसभा और राज्यसभा चुनावों तक, दोनों पार्टियां कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगी। इस फैसले को मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की पार्टी डीएमके ने ‘विश्वासघात’ करार दिया है। वहीं, कांग्रेस का तर्क है कि वे जनभावना और जनादेश का सम्मान कर रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बीजेपी को तमिलनाडु की धरती से दूर रखने और प्रदेश के विकास के लिए यह साहसी कदम उठाना अनिवार्य था।
पर्दे के पीछे की कहानी: राहुल गांधी के करीबियों ने पहले ही भांप ली थी ‘विजय सुनामी’
विजय की महज दो साल पुरानी पार्टी टीवीके ने विधानसभा चुनाव में जिस तरह की प्रचंड जीत हासिल की है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को स्तब्ध कर दिया है। हालांकि, दिल्ली और चेन्नई के गलियारों में बैठे कुछ कांग्रेस नेताओं के लिए यह अप्रत्याशित नहीं था। राहुल गांधी के भरोसेमंद सांसद मणिकम टैगोर और प्रोफेशनल कांग्रेस के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती जैसे युवा चेहरों ने चुनाव से काफी पहले ही पार्टी आलाकमान को आगाह कर दिया था कि तमिलनाडु में बदलाव की लहर चल रही है।
इन नेताओं ने आंतरिक बैठकों में पूरी ताकत लगाई कि कांग्रेस डीएमके के बजाय विजय के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करे। लेकिन उस समय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने कोई बड़ा सियासी जोखिम उठाने के बजाय पुराने साथी डीएमके के साथ ही बने रहने और सीटों की सौदेबाजी करने को प्राथमिकता दी। अगर समय रहते यह फैसला लिया जाता, तो शायद चुनावी नतीजे और भी व्यापक हो सकते थे।
सीटों का गणित और डीएमके के साथ बढ़ता तनाव
गठबंधन की बातचीत के दौरान कांग्रेस ने डीएमके के सामने अपनी मांगें स्पष्ट रखी थीं। कांग्रेस चाहती थी कि उसे कम से कम 40 विधानसभा सीटें दी जाएं और चुनाव जीतने पर सरकार में कैबिनेट हिस्सेदारी (मंत्रीपद) मिले। पिछले कई दशकों से तमिलनाडु में कांग्रेस सरकार से बाहर रही है, इसलिए ‘मंत्रिमंडल में जगह’ उनकी सबसे बड़ी शर्त थी।
डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने कांग्रेस की इन मांगों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने न तो मंत्रीपद देने का वादा किया और न ही 25-30 से अधिक सीटें देने पर सहमति जताई। दूसरी ओर, विजय की टीवीके कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें देने के साथ-साथ सरकार में शामिल करने के लिए भी तैयार थी। हालांकि, अंतिम समय में मल्लिकार्जुन खरगे और पी. चिदंबरम के हस्तक्षेप के बाद कांग्रेस 28 विधानसभा सीटों और एक राज्यसभा सीट पर मान गई और डीएमके के साथ चुनाव लड़ा। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी और स्टालिन के बीच की दूरी साफ दिखी, जहाँ दोनों ने एक साथ मंच साझा करने से परहेज किया।
चेन्नई में फैसले की रणनीति: दिल्ली में ‘दरवाजा खुला’ रखने की कोशिश
चुनाव नतीजों के दिन जैसे ही यह साफ हुआ कि डीएमके सत्ता से बाहर हो गई है, राहुल गांधी ने बिना देरी किए विजय को फोन कर जीत की बधाई दी और सहयोग का आश्वासन दिया। इसके बाद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष खरगे, राहुल गांधी और केसी वेणुगोपाल के बीच लंबी मंत्रणा हुई। खरगे शुरू में डीएमके का साथ छोड़ने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर संसद के भीतर डीएमके विपक्ष का एक मजबूत हिस्सा है।
हालांकि, राहुल गांधी के दबाव के बाद उन्होंने अपनी सहमति दे दी। लेकिन एक चालाक कूटनीतिक चाल चलते हुए यह तय किया गया कि गठबंधन तोड़ने का औपचारिक ऐलान दिल्ली के बजाय चेन्नई में प्रदेश कांग्रेस की बैठक में किया जाए। इसके पीछे सोच यह थी कि राष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश न जाए कि कांग्रेस ने हारते ही अपने पुराने सहयोगी को बीच मझधार में छोड़ दिया। इससे दिल्ली में विपक्षी एकता के लिए डीएमके के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रहेगा।
बहुमत का आंकड़ा और शपथ ग्रहण में राहुल गांधी की मौजूदगी
तमिलनाडु की 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 118 सीटों की आवश्यकता है। विजय की पार्टी अकेले ही बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंच चुकी है, लेकिन उसे सरकार को स्थिरता देने के लिए लगभग 10 और विधायकों के समर्थन की जरूरत है। कांग्रेस के पास वर्तमान में 5 विधायक हैं, जो विजय के लिए संजीवनी का काम करेंगे।
सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस अब विजय सरकार में दो महत्वपूर्ण मंत्रालयों की उम्मीद कर रही है। यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो राहुल गांधी स्वयं विजय के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होकर इस नए ‘पॉवर कपल’ (विजय-राहुल) की शुरुआत का संदेश देंगे। कांग्रेस के कुछ नेताओं का तो यहाँ तक कहना है कि यदि चुनाव से पहले ही यह गठबंधन हो जाता, तो यह जोड़ी 200 से अधिक सीटें जीत सकती थी।
साठ साल बाद सरकार में वापसी और संगठन की मजबूती
कांग्रेस के लिए विजय के साथ जाने की सबसे बड़ी वजह सत्ता में वापसी है। करीब छह दशकों (1967 के बाद) से कांग्रेस तमिलनाडु में सत्ता का सुख नहीं भोग पाई है। टीवीके के साथ जुड़कर उसे न केवल सरकार चलाने का अनुभव मिलेगा, बल्कि अपने कैडर और संगठन को फिर से जीवित करने का मौका भी मिलेगा।
दिलचस्प बात यह है कि विजय और राहुल गांधी के बीच संबंध 2009 से ही मधुर रहे हैं। विजय के राजनीतिक आदर्शों में कांग्रेस के दिग्गज नेता के. कामराज की झलक मिलती है, जिनकी प्रतिमा टीवीके मुख्यालय में भी स्थापित है। चूंकि टीवीके एक नई पार्टी है और उसके पास अनुभवी प्रशासकों की कमी है, कांग्रेस को लगता है कि विजय उनके साथ वह सम्मानजनक व्यवहार करेंगे, जो उन्हें डीएमके के साथ नहीं मिल पा रहा था।
असली अग्निपरीक्षा: तीन साल बाद होने वाला लोकसभा चुनाव
हालांकि अभी तो जश्न का माहौल है, लेकिन राहुल गांधी और विजय की असली परीक्षा तीन साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में होगी। पिछले दो लोकसभा चुनावों में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ने तमिलनाडु और पुडुचेरी की 40 सीटों पर लगभग क्लीन स्वीप किया था। अब जब कांग्रेस और डीएमके अलग हो चुके हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय होगा।
अगले लोकसभा चुनाव में डीएमके कांग्रेस को ‘सबक’ सिखाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक देगी। क्या विजय अपनी लोकप्रियता को राष्ट्रीय स्तर के चुनाव में भी बरकरार रख पाएंगे? और क्या राहुल गांधी इस नए गठबंधन के सहारे तमिलनाडु से अपनी सीटों की संख्या बढ़ा पाएंगे? यह देखना दिलचस्प होगा। फिलहाल, तमिलनाडु की राजनीति एक नए और अनिश्चित लेकिन रोमांचक मोड़ पर खड़ी है।

