Lord Ram Message : वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब अधर्म के प्रतीक रावण का अंत हुआ, तो स्वर्ण नगरी लंका गहरे शोक और अंधकार में डूब गई। रावण ने अपने जीवन में अहंकार और अधर्म का मार्ग चुना था, जिसके परिणामस्वरूप उसका विनाश सुनिश्चित हुआ। हालांकि, रामायण इस तथ्य को भी रेखांकित करती है कि बुराइयों के बावजूद रावण एक असाधारण विद्वान, प्रकांड पंडित और भगवान शिव का अनन्य भक्त था। उसकी मृत्यु मात्र एक राजा का अंत नहीं थी, बल्कि एक ऐसे युग की समाप्ति थी जिसने शक्ति और ज्ञान का दुरुपयोग किया। युद्ध भूमि में रावण के प्राण पखेरू उड़ते ही चारों ओर सन्नाटा पसर गया, जो इस बात का प्रतीक था कि प्रकृति भी एक महान, किंतु भटके हुए योद्धा के अवसान पर स्तब्ध थी।
Lord Ram Message : विभीषण का इनकार और भगवान राम का ऐतिहासिक धर्मोपदेश
रावण वध के पश्चात एक अत्यंत भावुक और वैचारिक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई। प्रभु श्री राम ने जब विभीषण से अपने ज्येष्ठ भ्राता का अंतिम संस्कार करने का आग्रह किया, तो विभीषण ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। विभीषण का तर्क था कि रावण एक पापी था, जिसने माता सीता का अपहरण कर पराई स्त्री का अपमान किया और सदैव धर्म के विरुद्ध आचरण किया। विभीषण के अनुसार, एक अधर्मी भाई का अंतिम संस्कार करना उनके लिए संभव नहीं था। तब मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने विभीषण को धर्म की सूक्ष्म व्याख्या समझाते हुए कहा, “मरणान्तानि वैराणि” अर्थात् मृत्यु के साथ ही समस्त शत्रुता का अंत हो जाता है। राम ने विभीषण को स्मरण कराया कि रावण वेदों का ज्ञाता और एक महान वीर था, और अब वह उनके लिए वैसे ही भाई तुल्य है जैसे स्वयं राम के लिए।
Lord Ram Message : राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ रावण का अंतिम संस्कार
श्री राम के वचनों में छिपे गहन धर्म और करुणा को समझकर विभीषण का हृदय परिवर्तन हुआ और वे अंतिम संस्कार के लिए सहमत हो गए। लंका के महान सम्राट का अंतिम संस्कार पूरी तरह से शाही रीति-रिवाजों और शास्त्रोक्त विधि से संपन्न किया गया। रावण की देह के लिए चंदन की लकड़ियों, सुगंधित मसालों और पुष्पमालाओं से सुसज्जित एक भव्य चिता तैयार की गई। प्रकांड ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विभीषण ने दाह संस्कार की रस्में पूरी कीं। इस शोकाकुल अवसर पर रावण की पटरानी मंदोदरी और लंका की अन्य महिलाएं उपस्थित थीं, जिन्होंने अश्रुपूरित नेत्रों से अपने राजा को विदाई दी। इस दृश्य की महानता तब और बढ़ गई जब स्वयं श्री राम अपनी वानर सेना के साथ वहां उपस्थित हुए और एक महान योद्धा के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।
पश्चाताप की अग्नि और रावण को मोक्ष की प्राप्ति
पौराणिक मान्यताओं और विद्वानों के अनुसार, रावण ने अपनी अंतिम सांस त्यागने से पूर्व तीन बार ‘राम’ नाम का उच्चारण किया था। यह उसके हृदय में उपजे उस प्रायश्चित का प्रतीक था, जिसने उसके जीवन भर के पापों को धो डाला। हिंदू शास्त्रों में यह वर्णित है कि मृत्यु के समय भगवान के नाम का स्मरण करने मात्र से आत्मा को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि रामायण के मर्मज्ञ मानते हैं कि रावण की आत्मा को अंततः मोक्ष प्राप्त हुआ। रावण का अंत हमें यह सिखाता है कि भले ही मनुष्य ने कितना भी गलत मार्ग क्यों न चुना हो, ईश्वर की शरण में अंतिम क्षणों में किया गया समर्पण भी उसे सद्गति प्रदान कर सकता है।
राम का संदेश: बुराई से घृणा करें, व्यक्ति से नहीं
रावण के अंतिम संस्कार की यह संपूर्ण घटना भगवान राम के उदात्त चरित्र और उनके महान गुणों का जीवंत प्रमाण है। राम ने संसार को यह शाश्वत संदेश दिया कि हमें व्यक्ति की गलतियों या उसके कृत्यों से घृणा करनी चाहिए, न कि स्वयं उस मनुष्य से। शत्रुता केवल जीवित रहने तक और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष तक ही सीमित होनी चाहिए। जैसे ही शत्रु के प्राण निकलते हैं, वह केवल एक मृत देह रह जाता है जिसे सम्मान पाना उसका अधिकार है। यह प्रसंग मानवता, क्षमा और उदारता का एक ऐसा दर्पण है, जो आज के युग में भी प्रासंगिक है। भगवान राम का यह आचरण ही उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनाता है, जो शत्रु में भी विद्वत्ता और गुणों का सम्मान करना जानते थे।
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