Operation Epic Fury: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बेबाक और अनपेक्षित बयानों के लिए विश्व भर में जाने जाते हैं। वर्तमान में जब ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेना का भीषण ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) अपने चरम पर है, ट्रंप ने एक बार फिर सबको हैरान कर दिया है। कभी खुद को नोबेल शांति पुरस्कार का सबसे योग्य उम्मीदवार बताने वाले ट्रंप ने अब इस प्रतिष्ठित सम्मान से पूरी तरह दूरी बना ली है। ‘वॉशिंगटन एग्जामिनर’ को दिए एक विशेष इंटरव्यू में उन्होंने अपनी इस नई सोच या शायद छिपी हुई हताशा को जगजाहिर किया है।
Operation Epic Fury: ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और ईरान में सत्ता परिवर्तन
इस समय अमेरिकी सेना ईरान के भीतर ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को अंजाम दे रही है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि यह अभियान वहां की जनता को तानाशाही शासन से मुक्ति दिलाने का एक ‘आजादी मिशन’ है। इसी सैन्य कार्रवाई के दौरान ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो चुकी है, जिन्हें ट्रंप अक्सर आतंकी शासन का प्रतीक बताते रहे हैं। युद्ध की इस विभीषिका के बीच, जहाँ एक तरफ बमबारी और सैन्य रणनीतियां केंद्र में हैं, ट्रंप को अब शांति पुरस्कार की चर्चा करना शायद बेमानी लग रहा है।
Operation Epic Fury: हताशा या रणनीति? इंटरव्यू में दिखा ट्रंप का बदला हुआ अंदाज
गुरुवार को हुए इंटरव्यू के दौरान जब ट्रंप से उनके नोबेल जीतने की संभावनाओं पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में कहा कि उन्हें अब इस पुरस्कार में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विदेशी नेताओं से फोन पर होने वाली उनकी वार्ताओं में कभी ‘नोबेल प्राइज’ का जिक्र नहीं होता। जानकारों का विश्लेषण है कि बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों और नोबेल कमेटी द्वारा नजरअंदाज किए जाने के बाद, ट्रंप ने अब अपनी छवि एक ‘योद्धा’ के रूप में पेश करने की रणनीति अपनाई है।
शांति के मसीहा से युद्ध के नायक तक का सफर
ट्रंप का यह बयान उनके पुराने दावों के बिल्कुल विपरीत है। इसी साल जनवरी में उन्होंने गर्व से घोषणा की थी कि पूरी दुनिया में उनसे बड़ा नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार कोई दूसरा व्यक्ति नहीं है। उनका तर्क था कि उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए साहसिक फैसलों ने कई संभावित वैश्विक युद्धों को टाला और लाखों जानें बचाईं। हालांकि, मिडिल ईस्ट में बदलते समीकरणों और ईरान में सीधे सैन्य हस्तक्षेप ने अब उनके राजनीतिक विमर्श (Narrative) को ‘शांति’ से हटाकर ‘परिवर्तन’ पर केंद्रित कर दिया है।
वेनेजुएला की पेशकश और नोबेल कमेटी के सख्त नियम
पिछले साल जब वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारा कोरिना मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसे डोनाल्ड ट्रंप को सौंपने की इच्छा जताई थी। ट्रंप समर्थकों के लिए यह एक गौरवशाली क्षण था, लेकिन नोबेल कमेटी ने तकनीकी आधार पर इसे नामुमकिन करार दिया। कमेटी के कड़े नियमों के अनुसार, शांति पुरस्कार एक व्यक्तिगत सम्मान है जिसे किसी दूसरे व्यक्ति या नेता को हस्तांतरित (Transfer) करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और भविष्य की दिशा
ट्रंप की अब इस पुरस्कार में बेरुखी यह संकेत देती है कि वे अब अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा के बजाय अपने ‘मिशन’ की सफलता को अधिक महत्व दे रहे हैं। उनके लिए ईरान में शासन परिवर्तन और अमेरिकी वर्चस्व को पुनः स्थापित करना किसी भी अवॉर्ड से बड़ा लक्ष्य बन चुका है। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ की सफलता या असफलता ही अब उनके भविष्य की राजनीतिक विरासत तय करेगी, न कि ओस्लो से मिलने वाला कोई शांति पदक।
