Crude Oil Shock: मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य संघर्ष और ईरान-इजरायल युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मचा दी है। मंगलवार को लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल दर्ज किया गया। इस तेजी का मुख्य कारण ईरानी सरकार द्वारा ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को बंद करने का कड़ा फैसला है। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस समुद्री मार्ग के बंद होने की खबर ने निवेशकों के बीच चिंता पैदा कर दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति ठप होने का डर सता रहा है। यदि यह तनाव कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।
Crude Oil Shock: ब्रेंट क्रूड के आंकड़े: जनवरी 2025 के बाद सबसे उच्चतम स्तर पर भाव
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मंगलवार को ब्रेंट क्रूड वायदा में 1.4 प्रतिशत यानी लगभग 1.10 डॉलर की वृद्धि देखी गई, जिसके बाद यह 78.83 डॉलर प्रति बैरल पर पहुँच गया। गौरतलब है कि सोमवार को कारोबार के दौरान कीमतें 82.37 डॉलर के स्तर को छू गई थीं, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि दिन के अंत में इसमें मामूली नरमी आई, फिर भी यह 6.7 प्रतिशत की कुल मजबूती के साथ बंद हुआ। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक युद्ध की स्थिति बनी रहेगी, कच्चे तेल की कीमतों को इसी तरह का ‘पैनिक सपोर्ट’ मिलता रहेगा।
Crude Oil Shock: होर्मुज स्ट्रेट का महत्व: वैश्विक तेल आपूर्ति का 20 प्रतिशत हिस्सा दांव पर
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल गलियारा माना जाता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकीर्ण समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा इसे बंद किए जाने का सीधा अर्थ है कि दुनिया भर में होने वाली तेल की सप्लाई में एक बड़ा व्यवधान आएगा। हालांकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे देशों के पास प्रतिदिन 40 से 50 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन की क्षमता है, लेकिन समस्या यह है कि इस अतिरिक्त आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी इसी जलडमरूमध्य पर निर्भर है। ऐसे में विकल्प तलाशना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है।
भविष्य का अनुमान: 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकते हैं दाम
मौजूदा अनिश्चितता को देखते हुए रक्षा और ऊर्जा विशेषज्ञों ने डरावने अनुमान पेश किए हैं। जानकारों का मानना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचा और समुद्री रास्तों पर रुकावट जारी रही, तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें आसानी से 100 से 115 डॉलर के पार निकल जाएंगी। यदि स्थिति और अधिक बिगड़ती है और प्रमुख तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचता है, तो कीमतें 120 से 140 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्च स्तर तक जा सकती हैं। यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगी।
भारत पर असर: बढ़ते आयात बिल और महंगाई का दोहरा प्रहार
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80-85 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाली एक डॉलर की भी बढ़ोत्तरी भारत के आयात बिल को हजारों करोड़ रुपये बढ़ा देती है। यदि कच्चा तेल इसी तरह महंगा होता रहा, तो देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) के दाम बढ़ना निश्चित है। परिवहन लागत बढ़ने से फल, सब्जियां और अन्य रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो जाएंगी, जिसका सीधा बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ेगा। सरकार के लिए राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना भी एक बड़ी चुनौती बन जाएगा।
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