पर्युषण पर्व जैन धर्म का सबसे पवित्र और आत्मशुद्धि पर केंद्रित पर्व है, जिसे श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय अलग-अलग विधियों से मनाते हैं। यह पर्व आत्मनिरीक्षण, क्षमा, संयम और तपस्या का प्रतीक है। पर्युषण के दौरान उपवास, प्रतिक्रमण और आगम वाचन जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। दिगंबर संप्रदाय इसे ‘दशलक्षण धर्म’ के रूप में मनाता है। यह लेख पर्युषण पर्व के इतिहास, उद्देश्य, विधि और सामाजिक प्रभाव को विस्तार से 8 बिंदुओं में प्रस्तुत कर रहा है, ताकि पाठक इसकी गहराई को समझ सकें।
पर्युषण पर्व क्या है?
पर्युषण पर्व जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव है, जिसका उद्देश्य आत्मा की शुद्धि और संयम का अभ्यास करना है। ‘पर्युषण’ शब्द का अर्थ है-आत्मा के पास रहना या आत्मचिंतन करना। यह पर्व उपवास, ध्यान, स्वाध्याय और क्षमायाचना के माध्यम से मनाया जाता है। श्वेतांबर संप्रदाय इसे 8 दिनों तक और दिगंबर संप्रदाय 10 दिनों तक मनाता है। इस दौरान जैन अनुयायी सांसारिक गतिविधियों से दूर रहकर आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं। यह पर्व हर साल भाद्रपद मास में मनाया जाता है।
इसे कौन मनाता है?
पर्युषण पर्व विशेष रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है। श्वेतांबर और दिगंबर-दोनों संप्रदाय इसे अपनी परंपराओं के अनुसार मनाते हैं। श्वेतांबर समुदाय में इसे ‘पर्युषण पर्व’ कहा जाता है जबकि दिगंबर समुदाय इसे ‘दशलक्षण धर्म’ के रूप में मनाता है। इस पर्व में साधु-साध्वियों के प्रवचन, आगम वाचन, प्रतिक्रमण और उपवास प्रमुख होते हैं। जैन समाज के सभी वर्ग-बच्चे, युवा और वृद्ध-इस पर्व में भाग लेते हैं और आत्मशुद्धि की दिशा में प्रयास करते हैं।
यह कब मनाया जाता है?
पर्युषण पर्व भाद्रपद मास में मनाया जाता है। श्वेतांबर संप्रदाय इसे कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी तक मनाता है, जबकि दिगंबर संप्रदाय शुक्ल पक्ष की पंचमी से चतुर्दशी तक इसे मनाता है। यह पर्व वर्षा ऋतु के दौरान आता है, जब साधु-साध्वियां एक स्थान पर ठहरकर तपस्या करते हैं। पर्व के अंतिम दिन ‘संवत्सरी’ या ‘क्षमावाणी’ मनाई जाती है, जिसमें सभी से क्षमा मांगी जाती है। यह पर्व हर साल तिथि अनुसार बदलता है, इसलिए पंचांग के अनुसार इसकी तिथि निर्धारित होती है।
पर्युषण पर्व का उद्देश्य
इस पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि, संयम का अभ्यास और क्षमा की भावना को जागृत करना है। जैन धर्म में माना जाता है कि पर्युषण के दौरान व्यक्ति अपने कर्मों की समीक्षा करता है और आत्मचिंतन के माध्यम से आत्मा को शुद्ध करता है। यह पर्व अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और अनेकांतवाद जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। पर्युषण पर्व व्यक्ति को आत्मिक उन्नति की ओर ले जाता है और समाज में सहिष्णुता व मैत्री का संदेश फैलाता है।
क्या इसे दशलक्षण धर्म कहते हैं?
हाँ, दिगंबर संप्रदाय पर्युषण पर्व को ‘दशलक्षण धर्म’ के रूप में मनाता है। इसमें दस धर्मों-उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य-का अभ्यास किया जाता है। प्रत्येक दिन एक धर्म पर ध्यान केंद्रित किया जाता है और उस पर प्रवचन व चिंतन होता है। यह आत्मा को शुद्ध करने की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने भीतर के दोषों को पहचानता है और उन्हें दूर करने का संकल्प लेता है। दशलक्षण धर्म जैन दर्शन का सार है।
पर्व की धार्मिक विधि
पर्युषण पर्व के दौरान जैन अनुयायी उपवास, प्रतिक्रमण, सामायिक, स्वाध्याय और ध्यान करते हैं। श्वेतांबर संप्रदाय में कल्पसूत्र का वाचन होता है, जबकि दिगंबर संप्रदाय में तत्त्वार्थ सूत्र और अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा, प्रवचन और भजन-कीर्तन आयोजित होते हैं। उपवास के दौरान जल के अलावा कुछ नहीं लिया जाता है। कुछ लोग बेला, तेला, अठ्ठाई जैसे कठिन व्रत भी करते हैं। यह पर्व संयम और तपस्या का अभ्यास कराता है।
क्षमावाणी और संवत्सरी का महत्व
पर्युषण पर्व के अंतिम दिन ‘संवत्सरी’ या ‘क्षमावाणी’ मनाई जाती है। इस दिन जैन अनुयायी अपने पूरे वर्ष के व्यवहार की समीक्षा करते हैं और जिनसे भी जाने-अनजाने में कोई गलती हुई हो, उनसे क्षमा मांगते हैं। ‘मिच्छामी दुक्कड़म्’ कहकर क्षमा याचना की जाती है। यह दिन आत्मशुद्धि और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। क्षमावाणी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय संबंधों को सुधारने का अवसर भी है। यह पर्व क्षमा, करुणा और मैत्री का संदेश देता है।
सामाजिक और वैश्विक प्रभाव
पर्युषण पर्व का प्रभाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक स्तर पर भी देखा जाता है। भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान जैसे देशों में भी जैन समुदाय इसे श्रद्धा से मनाता है। इस पर्व के दौरान पर्यावरण शुद्धि, शाकाहार, जल संरक्षण और नैतिक जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाता है। स्कूलों, संस्थानों और समाज में क्षमा और संयम का संदेश फैलाया जाता है। यह पर्व विश्व मैत्री दिवस के रूप में भी मनाया जाता है, जो मानवता को जोड़ने का कार्य करता है।
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