राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) वह स्थिति होती है जब सरकार की कुल आय (excluding borrowings) उसके कुल व्यय से कम होती है। यह आर्थिक असंतुलन दर्शाता है, जिसमें सरकार अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उधारी का सहारा लेती है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार की कुल आय ₹20 लाख करोड़ है और खर्च ₹30 लाख करोड़, तो ₹10 लाख करोड़ का राजकोषीय घाटा कहलाएगा। यह किसी देश की आर्थिक नीति और वित्तीय प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण संकेतक होता है।
राजकोषीय घाटा कैसे होता है?
राजकोषीय घाटा तब होता है जब सरकार को अपेक्षित टैक्स और गैर-टैक्स आय नहीं मिलती, लेकिन उसे सामाजिक योजनाओं, रक्षा, सब्सिडी और प्रशासनिक खर्चों में धन खर्च करना पड़ता है। यदि आर्थिक मंदी हो या टैक्स संग्रहण कम हो, तब सरकार को घाटे की भरपाई उधारी से करनी पड़ती है। यह घाटा बजट में स्पष्ट रूप से दिखाया जाता है और इसके लिए सरकार को बॉन्ड जारी करने या बैंकों से ऋण लेने की आवश्यकता होती है।
राजकोषीय घाटे के प्रभाव
राजकोषीय घाटा एक हद तक देश की प्रगति के लिए सहायक हो सकता है, लेकिन जब यह सीमा से बाहर हो जाए तो कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इससे महंगाई बढ़ सकती है, ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और विदेशी निवेशक भारत की आर्थिक स्थिरता पर प्रश्न उठा सकते हैं। यदि घाटा लगातार बना रहे, तो यह देश की क्रेडिट रेटिंग को भी प्रभावित कर सकता है। इससे भविष्य में सरकार को अधिक ब्याज दरों पर ऋण लेना पड़ सकता है।
घाटे को कम करने के उपाय
राजकोषीय घाटा कम करने के लिए सरकार को अपनी आय और व्यय में संतुलन बनाना पड़ता है। इसके लिए टैक्स बेस को बढ़ाना, कर चोरी रोकना, लाभहीन सब्सिडी को समाप्त करना, सरकारी खर्चों को प्राथमिकता देना जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। इसके अलावा, डिजिटल टैक्स कलेक्शन, सरकारी कंपनियों का विनिवेश (Disinvestment) और उत्पादक क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना भी घाटा कम करने में मददगार होते हैं। एक मजबूत आर्थिक नीति और पारदर्शिता इसके नियंत्रण में सहायक होती है।
भारत में राजकोषीय घाटे की स्थिति
भारत में राजकोषीय घाटा हर साल बजट में घोषित किया जाता है। वर्ष 2024-25 के लिए यह सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 5.1 प्रतिशत अनुमानित है, जो महामारी के बाद धीरे-धीरे कम हो रहा है। भारत सरकार ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBM)’ के तहत इस घाटे को एक तय सीमा में रखने का प्रयास करती है। सरकार का लक्ष्य है कि इसे GDP के 3% तक लाया जाए, ताकि वित्तीय स्थिरता बनी रहे और देश की अर्थव्यवस्था विश्व स्तर पर मजबूत हो सके।
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