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मार्स: जानिए क्यों कहा जाता है इसे ‘लाल ग्रह’?

मार्स: जानिए क्यों कहा जाता है इसे 'लाल ग्रह'?

मार्स: सौरमंडल में मंगल ग्रह (Mars) को ‘लाल ग्रह’ के नाम से जाना जाता है। इसका कारण है इसकी सतह पर मौजूद लालिमा, जो कि लोहे के ऑक्साइड (iron oxide) यानी जंग के कारण उत्पन्न होती है। जब हम आकाश में इसे नंगी आंखों से देखते हैं, तो यह अन्य तारों की तुलना में हल्का लाल रंग का दिखाई देता है। इस लाल रंग के कारण ही इसे ‘रेड प्लैनेट’ कहा गया है। यह सूर्य से चौथा ग्रह है और आकार में पांचवें स्थान पर आता है। मंगल ग्रह का नाम रोमन युद्ध के देवता ‘मार्स’ के नाम पर रखा गया है। प्राचीन समय से ही विभिन्न संस्कृतियों में इसे विशेष महत्व दिया गया है। भारतीय ज्योतिष में भी मंगल को ऊर्जा, साहस और भूमि से संबंधित ग्रह माना जाता है। यह पृथ्वी के सबसे नजदीकी ग्रहों में से एक है।

मंगल ग्रह का वातावरण और सतह

मंगल ग्रह की सतह बहुत ही शुष्क, धूल भरी और पथरीली है। इसकी मिट्टी में लोहे की अधिक मात्रा होती है, जो ऑक्सीजन के संपर्क में आकर जंग खा जाती है और ग्रह को लाल रंग देती है। वहां का वातावरण बहुत पतला है, जिसमें लगभग 95% कार्बन डाइऑक्साइड होती है, लेकिन ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य होती है। तापमान अत्यधिक ठंडा होता है, जो-140°C से 20°C तक जा सकता है। यहां पर धूल भरी आंधियां भी चलती हैं, जो कई दिनों तक चल सकती हैं। सतह पर गहरी घाटियां, विशाल ज्वालामुखी और बर्फीले ध्रुवीय क्षेत्र हैं, जो इसे वैज्ञानिकों के लिए रोचक बनाते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि कभी मंगल पर जल मौजूद था, जिसके प्रमाण इसकी गहरी घाटियों और नदी-नालों जैसे संरचनाओं से मिलते हैं।

मंगल ग्रह पर मानव मिशन और वैज्ञानिक रुचि

मंगल ग्रह पर मानवता की रुचि पिछले कई दशकों से बनी हुई है। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी NASA और भारत की ISRO जैसी संस्थाएं लगातार इस ग्रह के अध्ययन में जुटी हैं। भारत का “मंगलयान” मिशन (Mangalyaan/MOM) एक ऐतिहासिक उपलब्धि रहा, जिसने भारत को मंगल तक पहुंचने वाला चौथा देश बनाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना हो सकती है, क्योंकि इसके कुछ क्षेत्रों में जल की बर्फ और मीथेन गैस पाई गई है। आने वाले वर्षों में मंगल पर मानव को बसाने की योजना भी बनाई जा रही है। एलन मस्क की स्पेसX कंपनी भी “मंगल कॉलोनी” की दिशा में प्रयासरत है। इन सब प्रयासों के पीछे यह विश्वास है कि मंगल ग्रह मानवता के लिए वैकल्पिक निवास स्थान बन सकता है।

पृथ्वी और मंगल के बीच समानताएं और अंतर

मंगल और पृथ्वी के बीच कुछ समानताएं भी हैं। जैसे मंगल का दिन लगभग 24.6 घंटे का होता है, जो पृथ्वी के दिन के समान है। इसके दो ध्रुवीय क्षेत्र हैं, जिनमें बर्फ की परतें होती हैं। इसके अलावा वहां पर भी ऋतु परिवर्तन होते हैं, हालांकि वो पृथ्वी से काफी अलग हैं। लेकिन अंतर यह है कि वहां का गुरुत्वाकर्षण बहुत कम है (पृथ्वी का लगभग 38%) और वहां जीवन के लिए आवश्यक वायुमंडलीय दबाव तथा तापमान नहीं है। मंगल पर न तो ऑक्सीजन है और न ही तरल जल की सतत उपलब्धता। वहां का वातावरण मनुष्यों के लिए घातक है। इसलिए यदि भविष्य में वहां जीवन संभव हो भी पाए, तो उसके लिए अत्यधिक उन्नत तकनीकों की आवश्यकता होगी।

मंगल ग्रह का खगोलशास्त्र में महत्व

खगोलशास्त्र में मंगल ग्रह को हमेशा से महत्वपूर्ण माना गया है। यह पृथ्वी से आसानी से देखा जा सकने वाला ग्रह है, जिसकी गति और स्थिति से जुड़ी जानकारियां प्राचीन खगोलशास्त्रियों ने भी दर्ज की हैं। भारतीय ज्योतिष में इसे “मंगल” नाम से जाना जाता है और यह जातक की भूमि, ऊर्जा, साहस और संतान से जुड़ी स्थितियों को प्रभावित करता है। वहीं, पश्चिमी ज्योतिष में भी इसे युद्ध और शक्ति का प्रतीक माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, मंगल ग्रह पर भेजे गए रोवर्स, ऑर्बिटर्स और सेटेलाइट्स ने हमें ब्रह्मांड की उत्पत्ति और विकास के बारे में गहरी जानकारी दी है। यह ग्रह भविष्य की अंतरिक्ष यात्राओं और मानव बसाहट की संभावनाओं के केंद्र में है, इसलिए इसका अध्ययन आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना हुआ है।

यह भी पढ़ें-पानीपत युद्ध:भारत में मुगलों के आगमन की कहानी

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