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Pakistan Civil War: पाकिस्तान में गृहयुद्ध जैसे हालात, शिया प्रदर्शनकारियों पर सेना और मरीन की गोलीबारी, 30 से ज्यादा मौतें

Pakistan Civil War

Pakistan Civil War: पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगिट-बाल्टिस्तान (PoGB) में स्थिति बेकाबू हो चुकी है। ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे शिया समुदाय के लोगों पर पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने घातक बल प्रयोग किया है। स्कार्दू से शुरू हुई यह चिंगारी अब पूरे देश में फैल गई है। सेना की सीधी गोलीबारी ने इस विरोध प्रदर्शन को खूनी संघर्ष में बदल दिया है, जिससे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा और सैन्य शासन की नैतिकता पर गंभीर अंतरराष्ट्रीय सवाल खड़े हो गए हैं। वर्तमान में कई संवेदनशील इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है, लेकिन जनता का आक्रोश थमता नजर नहीं आ रहा है।

Pakistan Civil War:  स्कार्दू में खूनी मंजर: सेना की अंधाधुंध फायरिंग में 38 मौतें

हिंसा का मुख्य केंद्र स्कार्दू शहर बना हुआ है, जहाँ 1 मार्च से बाल्टी-शिया समुदाय के लोग सड़कों पर हैं। चश्मदीदों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के बजाय पाकिस्तानी सेना और अर्द्धसैन्य बलों ने उन पर सीधे गोलियां बरसाईं। इस बर्बर कार्रवाई में अब तक 38 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हैं। अस्पतालों में आपातकाल घोषित कर दिया गया है और स्थानीय लोग सेना के इस ‘नरसंहार’ के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

Pakistan Civil War:  सैन्य ठिकानों और सरकारी इमारतों पर प्रदर्शनकारियों का धावा

सेना की गोलीबारी ने प्रदर्शनकारियों के गुस्से को और भड़का दिया है। आक्रोशित भीड़ ने स्कार्दू ब्रिगेड कमांडर के आवास और ‘नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री’ के मुख्यालय सहित कई सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया है। प्रदर्शनकारियों ने आर्मी पब्लिक स्कूल, पुलिस अधीक्षक कार्यालय और सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क जैसी महत्वपूर्ण इमारतों में आग लगा दी। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) के कार्यालय और संचार केंद्रों को भी जला दिया गया है, जो इस बात का संकेत है कि जनता अब किसी भी सरकारी या अंतरराष्ट्रीय संस्था के नियंत्रण में नहीं है।

राजधानी इस्लामाबाद में ‘अमेरिका विरोधी’ नारों की गूंज

यह विरोध केवल गिलगिट-बाल्टिस्तान तक सीमित नहीं है। राजधानी इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में शिया समुदाय के लोग खामेनेई के समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं। पाकिस्तान की कुल आबादी में लगभग 15 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला यह समुदाय अपने आध्यात्मिक नेता की मौत से बेहद आहत है। सड़कों पर ‘अमेरिका की मौत’ और ‘इजरायल की मौत’ के नारों के साथ निकाले जा रहे जुलूसों ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि अमेरिका और इजरायल के हमलों ने उनके सर्वोच्च नेता को उनसे छीना है।

अमेरिकी दूतावास का अलर्ट और अंतरराष्ट्रीय चिंता

पाकिस्तान में तेजी से बिगड़ते हालात को देखते हुए इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास ने अपने नागरिकों के लिए ‘ट्रैवल एडवाइजरी’ जारी की है। दूतावास ने विशेष रूप से बलोचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और पीओके के इलाकों में यात्रा न करने की सलाह दी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर चिंतित है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेना ने संयम नहीं बरता, तो यह असंतोष एक पूर्णकालिक गृहयुद्ध का रूप ले सकता है।

खंडहर बनते सरकारी दफ्तर और भविष्य की चुनौतियां

स्कार्दू और आसपास के इलाकों में सरकारी मशीनरी पूरी तरह ठप हो गई है। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के दफ्तर और ‘ग्रीन टूरिज्म’ के कार्यालय अब खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। अल्पसंख्यक शिया समुदाय अब पीछे हटने को तैयार नहीं है और वे मारे गए लोगों के लिए न्याय और सैन्य हस्तक्षेप को समाप्त करने की मांग पर अड़े हैं। पाकिस्तान सरकार के लिए यह दोहरी चुनौती है—एक तरफ बिगड़ती अर्थव्यवस्था और दूसरी तरफ अपने ही नागरिकों के खिलाफ छिड़ी यह जंग।

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