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Devshayani Ekadashi : देवशयनी एकादशी 2026 से चातुर्मास शुरू, भगवान विष्णु शयन काल और धार्मिक महत्व जानें

Devshayani Ekadashi

Devshayani Ekadashi : सनातन धर्म में आषाढ़ महीने को बेहद पवित्र, कल्याणकारी और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह कालखंड केवल धार्मिक बदलाव का ही साक्षी नहीं होता, बल्कि प्रकृति में भी व्यापक परिवर्तन लेकर आता है। इस दौरान भीषण गर्मी का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगता है और मनभावन वर्षा ऋतु का पृथ्वी पर आगमन होता है। हालांकि, इस पूरे महीने का सबसे मुख्य और बड़ा धार्मिक महत्व जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के शयन काल से जुड़ा हुआ है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हम सभी ‘देवशयनी एकादशी’ के नाम से जानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी विशेष दिन से भगवान विष्णु आगामी चार महीनों के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। हिंदू परंपराओं में इस चार महीने की दिव्य अवधि का एक विशिष्ट और गहरा महत्व विस्तार से बताया गया है।

साल 2026 में कब से प्रारंभ हो रहा है आषाढ़ का महीना?

द्रिक पंचांग की गणना के अनुसार, वर्ष 2026 में आषाढ़ मास का शुभारंभ 30 जून 2026, दिन मंगलवार से होने जा रहा है। इसके साथ ही इस पवित्र महीने का समापन 29 जुलाई 2026, दिन बुधवार को होगा। पारंपरिक हिंदू पंचांग के अनुसार आषाढ़ को वर्ष का चौथा महीना माना जाता है, जो अपने साथ कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार लेकर आता है।

देवशयनी एकादशी का पावन महत्व और चातुर्मास की शुरुआत

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को देवशयनी एकादशी या हरि शयनी एकादशी कहा जाता है। शास्त्रों में ऐसी दृढ़ मान्यता है कि इसी तिथि से भगवान विष्णु क्षीर सागर में वास करते हुए शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद वे निरंतर चार महीनों तक विश्राम की अवस्था में रहते हैं और फिर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवउठनी एकादशी कहा जाता है, के दिन जागते हैं।

विष्णु के शयन की इस चार महीने की पवित्र अवधि को ही ‘चातुर्मास’ के नाम से जाना जाता है। इस चातुर्मास के दौरान सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह विराम लग जाता है। जब चातुर्मास समाप्त होता है, तभी समाज में विवाह, मुंडन, जनेऊ संस्कार और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत दोबारा की जाती है। पंचांग के अनुसार, साल 2026 में देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026, दिन शनिवार को मनाई जाएगी।

आखिर श्रीहरि विष्णु क्यों धारण करते हैं योगनिद्रा का रूप?

पौराणिक ग्रंथ विष्णु पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु इस संपूर्ण चराचर सृष्टि के नियंता और पालनकर्ता हैं। देवशयनी एकादशी के दिन उनका योगनिद्रा में प्रवेश करना मात्र एक सामान्य विश्राम नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत गूढ़, दिव्य और आध्यात्मिक प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस विशेष कालखंड के दौरान भगवान विष्णु बाहरी सांसारिक गतिविधियों से खुद को अलग कर लेते हैं और आंतरिक रूप से सृष्टि के सूक्ष्म संतुलन को बनाए रखने पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। योगनिद्रा का वास्तविक अर्थ साधारण नींद कदापि नहीं है, बल्कि यह चेतना की वह परम दिव्य अवस्था है जिसमें ईश्वर केवल गहन ध्यान में लीन रहते हैं। इसी गहन ध्यान के कारण इसे योगनिद्रा की संज्ञा दी गई है।

चातुर्मास की अवधि में मांगलिक कार्यों पर रोक के मुख्य कारण

आषाढ़ महीने से लेकर कार्तिक महीने तक का यह समय मुख्य रूप से मुख्य वर्षा ऋतु का काल होता है। प्राचीन काल में इस मौसम में अत्यधिक बारिश के कारण यात्राएं करना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण होता था। इसी वजह से उस दौर में साधु-संत और ऋषि-मुनि भी यात्राएं बंद करके एक ही स्थान पर रुककर तप, जप, स्वाध्याय और ईश्वर की साधना किया करते थे। व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण ही इस अवधि में विवाह और अन्य बड़े सामूहिक आयोजनों को टालने की यह सुंदर परंपरा आरंभ हुई। इसके साथ ही एक बड़ी धार्मिक मान्यता यह भी जुड़ी है कि जब स्वयं सृष्टि के पालनकर्ता भगवान जनार्दन योगनिद्रा में हों, तब इंसानों को किसी भी नए शुभ या मांगलिक कार्य की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। यही कारण है कि सभी शुभ कार्य देवउठनी एकादशी के बाद ही संपन्न किए जाते हैं।

आषाढ़ मास में सुख-समृद्धि के लिए किए जाने वाले शुभ कार्य

धार्मिक दृष्टिकोण से आषाढ़ मास के भीतर भगवान विष्णु की विशेष आराधना, व्रत, दान-पुण्य, मंत्रों का जप और पवित्र ग्रंथों के पाठ का अनंत महत्व बताया गया है। इस पूरे महीने में नियमित रूप से विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना, श्रीहरि का ध्यान लगाना, तुलसी के पौधे की विशेष पूजा करना और असहाय या जरूरतमंद लोगों को अपनी सामर्थ्य अनुसार दान देना सर्वोत्तम और परम फलदायी माना जाता है। शास्त्रों में ऐसी अटूट मान्यता है कि इस विशेष महीने में पूरी श्रद्धा से किए गए सभी धार्मिक और सात्विक कार्य सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य फल प्रदान करते हैं। यह शुभ कर्म मनुष्य के जीवन से दुखों का नाश करते हैं और सुख, मानसिक शांति तथा समृद्धि के नए मार्ग खोलते हैं।

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