BJP Comeback : 4 जून 2024 की वह सुबह भारतीय जनता पार्टी के लिए किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं थी। ‘400 पार’ के ऊंचे नारे और अटूट आत्मविश्वास के साथ चुनावी समर में उतरी बीजेपी महज 240 सीटों पर सिमट कर रह गई। यह नतीजा न केवल पार्टी के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़े आश्चर्य की तरह था। एक दशक बाद पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों का सहारा लेना पड़ा। विपक्ष ने इस परिणाम को मोदी युग के कमजोर होने और देश में बदलाव की बयार की शुरुआत के रूप में प्रचारित किया। लेकिन शायद उस वक्त किसी ने यह नहीं सोचा था कि महज दो वर्षों में यही राजनीतिक कहानी ऐसी नाटकीय करवट लेगी कि मोदी और बीजेपी एक बार फिर 2029 के सबसे शक्तिशाली और निर्विवाद दावेदार के रूप में उभर कर सामने आ जाएंगे।
हार के बाद संगठन की कमजोरियों पर हुआ गहन आत्ममंथन
चुनावी झटके के तुरंत बाद बीजेपी और उसके वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बिना किसी देरी के संगठनात्मक कमियों और चूकों पर खुलकर मंथन और विचार-विमर्श शुरू किया। संघ से जुड़े वरिष्ठ नेताओं और विश्लेषकों ने इस हार के कई प्रमुख कारण गिनाए। कार्यकर्ताओं में फैले अत्यधिक और अनुचित आत्मविश्वास को सबसे बड़ी गलती माना गया। बूथ स्तर पर समन्वय की गंभीर कमी और विवादास्पद छवि वाले नेताओं को टिकट देने की बात भी सामने आई। इसके अलावा आरक्षण के मुद्दे पर फैले कथित दुष्प्रचार और कुछ राज्यों में टिकट वितरण की खामियों ने भी पार्टी की स्थिति को कमजोर किया। इस ईमानदार आत्ममंथन ने आगे की रणनीति बनाने में बीजेपी को बड़ी मदद दी।
उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में मिली थी सबसे कड़ी चुनौती
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे कठिन और निर्णायक मोर्चा उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में खुला। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के मजबूत गठबंधन ने बीजेपी को जबरदस्त टक्कर दी और पार्टी को कई महत्वपूर्ण सीटें गंवानी पड़ीं। महाराष्ट्र में भी विपक्षी महाविकास अघाड़ी गठबंधन ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए बीजेपी और उसके सहयोगियों को पीछे धकेला। इन दोनों बड़े राज्यों में संगठनात्मक कमजोरी, स्थानीय स्तर पर जनता के बीच असंतोष और विपक्ष की एकजुट रणनीति का सीधा असर चुनावी नतीजों पर साफ दिखाई दिया। इन पराजयों ने बीजेपी को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
हरियाणा की जीत बनी बीजेपी की शानदार वापसी का पहला संकेत
लोकसभा चुनाव के कुछ महीनों बाद ही हरियाणा विधानसभा चुनाव ने बीजेपी की राजनीतिक वापसी की कहानी का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लिखा। पूरे राज्य में सत्ता विरोधी लहर और तीव्र माहौल के बावजूद बीजेपी ने न केवल चुनाव जीता बल्कि लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस जीत के पीछे पार्टी द्वारा बूथ स्तर पर बेहतर प्रबंधन, जमीनी नेटवर्क की पुनः मजबूती और चुनावी रणनीति में किए गए आमूलचूल सुधारों का बड़ा योगदान था। हरियाणा की इस जीत ने पार्टी का टूटा हुआ मनोबल फिर से ऊंचा किया और यह संदेश दिया कि लोकसभा की हार महज एक अपवाद था।
महाराष्ट्र और बिहार में बड़ी जीत ने विपक्ष को किया बेअसर
हरियाणा की सफलता के बाद महाराष्ट्र और बिहार में भी बीजेपी नीत गठबंधनों ने जबरदस्त और निर्णायक जीत हासिल की। महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन ने विपक्ष को बुरी तरह शिकस्त देते हुए भारी बहुमत से सत्ता पर कब्जा किया। बिहार में भी एनडीए ने प्रचंड बहुमत के साथ अपनी सरकार बरकरार रखी। इन दो बड़े और राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्यों में मिली इन शानदार जीतों ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भी बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा, चुनावी मशीनरी और जनाधार न केवल बरकरार है बल्कि और अधिक मजबूत होता जा रहा है। विपक्ष की उम्मीदों पर एक के बाद एक पानी फिरता जा रहा था।
पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक सफलता — बीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सफलता को पार्टी की हालिया राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। एक समय में जो पार्टी बंगाल में मात्र तीन सीटों तक सीमित थी, उसने धीरे-धीरे अपना आधार इतना व्यापक बना लिया कि ममता बनर्जी के दशकों पुराने और अभेद्य राजनीतिक वर्चस्व को सीधी चुनौती देना संभव हो गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल की यह सफलता महज एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि इसने पूरी राष्ट्रीय राजनीति में बीजेपी को नई ऊर्जा, नया उत्साह और नई दिशा दी है।
INDIA गठबंधन की बढ़ती दरारें और 2029 का नया राजनीतिक समीकरण
जहां एक तरफ बीजेपी एक के बाद एक चुनावी सफलताएं अर्जित करती रही, वहीं INDIA गठबंधन अपनी आंतरिक एकजुटता बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष करता दिखा। कई राज्यों में विपक्षी दलों के बीच मतभेद और अंतर्विरोध खुलकर सामने आए। कांग्रेस पार्टी अभी भी लोकसभा में 100 सीटों के आंकड़े से नीचे बनी हुई है, जो विपक्ष की कमजोर स्थिति को उजागर करता है। दो साल पहले जिस चुनावी परिणाम को मोदी के राजनीतिक पतन की शुरुआत बताया जा रहा था, आज वही चर्चा उनके 2029 तक सबसे मजबूत दावेदार बने रहने पर केंद्रित है। राजनीतिक जानकारों का साफ मानना है कि यदि बीजेपी अपनी संगठनात्मक मजबूती बनाए रखती है और विपक्ष अपने मतभेद दूर नहीं कर पाता, तो 2029 के आम चुनाव में पार्टी एक बार फिर स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर सकती है।
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