Mahabharat story: महाभारत का युद्ध केवल एक साम्राज्य की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह वर्षों से संचित श्रापों, प्रतिज्ञाओं और कर्मों का लेखा-जोखा था। कुरुक्षेत्र के मैदान में 18 दिनों तक चले इस विनाशकारी युद्ध में अंततः पांडवों की विजय हुई। हालांकि, इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक क्षण दसवें दिन आया, जब अजेय भीष्म पितामह को ‘शरशय्या’ (बाणों की शय्या) पर लेटना पड़ा। भीष्म की मृत्यु का कारण कोई महान योद्धा नहीं, बल्कि एक राजकुमारी का अटूट प्रतिशोध था। आइए विस्तार से जानते हैं राजकुमारी अंबा से शिखंडी बनने की यह अलौकिक गाथा।
Mahabharat story: काशीराज की पुत्रियों का हरण और अंबा का धर्मसंकट
महाभारत काल की शुरुआत में, राजा शांतनु और सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य के विवाह हेतु भीष्म पितामह ने काशीराज की तीन पुत्रियों—अंबा, अंबिका और अंबालिका का बलपूर्वक हरण किया था। जब उन्हें हस्तिनापुर लाया गया, तब ज्येष्ठ पुत्री अंबा ने भीष्म को सूचित किया कि वह मानसिक रूप से राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी हैं। भीष्म ने धर्म का पालन करते हुए अंबा को ससम्मान शाल्व के पास भेज दिया। किंतु शाल्व ने यह कहकर अंबा को स्वीकार करने से मना कर दिया कि वह दूसरे पुरुष द्वारा जीती जा चुकी हैं।
Mahabharat story: भीष्म की प्रतिज्ञा और अंबा का तिरस्कार
अपमानित होकर अंबा पुनः भीष्म के पास लौटीं और उनसे विवाह करने का प्रस्ताव रखा। भीष्म अपनी ‘भीषण’ ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा से बंधे थे, इसलिए उन्होंने विवाह से इनकार कर दिया। दर-दर भटकने और समाज द्वारा उपहास सहने के बाद, अंबा के मन में भीष्म के प्रति प्रतिशोध की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने अपने गुरु भगवान परशुराम से न्याय की गुहार लगाई। भीष्म और परशुराम के बीच भीषण युद्ध हुआ, किंतु इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण भीष्म पराजित न हुए।
भगवान शिव की तपस्या और मृत्यु का वरदान
हार मानकर अंबा ने भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए। अंबा ने वरदान मांगा कि वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनें। महादेव ने वरदान दिया, किंतु स्पष्ट किया कि यह केवल अगले जन्म में ही संभव होगा। प्रतिशोध की ज्वाला में जलती अंबा ने उसी क्षण अग्नि में कूदकर अपनी देह त्याग दी, ताकि वह शीघ्र पुनर्जन्म लेकर अपना संकल्प पूरा कर सकें।
शिखंडी का जन्म और पुरुषत्व की प्राप्ति
अगले जन्म में अंबा ने राजा द्रुपद के यहाँ ‘शिखंडी’ के रूप में जन्म लिया। यद्यपि वह एक कन्या के रूप में जन्मी थीं, किंतु द्रुपद ने उनका पालन-पोषण एक पुत्र की तरह किया। कालांतर में एक यक्ष की सहायता से शिखंडी को पुरुषत्व प्राप्त हुआ और वह एक कुशल योद्धा के रूप में विकसित हुए। यही वह माध्यम था जिसे नियति ने भीष्म के अंत के लिए चुना था।
कुरुक्षेत्र का दसवां दिन और भीष्म का पतन
युद्ध के दसवें दिन, भगवान कृष्ण की रणनीति के अनुसार, अर्जुन ने शिखंडी को अपने रथ पर आगे बैठाया। भीष्म पितामह जानते थे कि शिखंडी पूर्व जन्म में अंबा थी और वह उसे स्त्री ही मानते थे। अपने सिद्धांतों के अनुसार, भीष्म ने एक स्त्री पर शस्त्र उठाने से मना कर दिया और अपना गांडीव नीचे रख दिया। इसी का लाभ उठाकर, अर्जुन ने शिखंडी की ओट से बाणों की वर्षा कर दी। भीष्म का शरीर बाणों से बिंध गया और वह रणभूमि में गिर पड़े, जिससे अंबा का सदियों पुराना प्रतिशोध पूर्ण हुआ।
