Iran-US Crisis: अमेरिकी राजनीति के दिग्गज और डोनाल्ड ट्रंप के बेहद करीबी माने जाने वाले सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में खलबली मचा दी है। ग्राहम ने हाल ही में एक टीवी साक्षात्कार के दौरान स्वीकार किया कि ईरान पर अमेरिकी हमलों और सैन्य कार्रवाई का वास्तविक उद्देश्य केवल परमाणु कार्यक्रम को रोकना नहीं, बल्कि ईरान के विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण हासिल करना है। उनके इस बेबाक बयान ने उन दावों को पुख्ता कर दिया है जो लंबे समय से तेहरान द्वारा वाशिंगटन पर लगाए जा रहे थे। ग्राहम की इस स्वीकारोक्ति ने अमेरिका की ‘लोकतंत्र बहाली’ और ‘सुरक्षा’ वाली दलीलों के पीछे छिपे आर्थिक हितों को बेनकाब कर दिया है।
Iran-US Crisis: चीन को कमजोर करने की रणनीति: वेनेजुएला और ईरान के तेल पर नजर
फोक्स न्यूज के साथ बातचीत करते हुए लिंडसे ग्राहम ने भू-राजनीतिक समीकरणों को विस्तार से समझाया। उन्होंने तर्क दिया कि वेनेजुएला और ईरान मिलकर दुनिया के लगभग 31 प्रतिशत तेल भंडार के मालिक हैं। ग्राहम के अनुसार, यदि अमेरिका इन संसाधनों पर अपना प्रभुत्व जमा लेता है, तो इसका सीधा लाभ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मिलेगा। इसके पीछे एक बड़ा रणनीतिक कारण चीन को पछाड़ना भी है। चूँकि बीजिंग अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर ईरान और वेनेजुएला से तेल आयात करता है, इसलिए इन भंडारों पर अमेरिकी नियंत्रण चीन की आर्थिक और सैन्य रफ्तार को काफी हद तक धीमा कर सकता है।
Iran-US Crisis: ईरान पर हमलों का सिलसिला: परमाणु कार्यक्रम का बहाना और हकीकत
पिछले कुछ समय से ईरान पर सैन्य दबाव बढ़ता जा रहा है। पिछले साल जून में इजरायल और अमेरिका द्वारा किए गए हमलों के बाद, इस साल 28 फरवरी से ईरानी शहरों पर फिर से बमबारी की खबरें सामने आ रही हैं। हालांकि, व्हाइट हाउस और अमेरिकी रक्षा विभाग हमेशा यही तर्क देते आए हैं कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान के परमाणु हथियारों के विकास को रोकना और क्षेत्र में इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वे तेहरान में सत्ता परिवर्तन की वकालत भी करते रहे हैं। लेकिन लिंडसे ग्राहम जैसे वरिष्ठ नेता की स्वीकारोक्ति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सैन्य क्षमताओं को कम करना केवल एक मुखौटा है, जबकि असली निशाना ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी तेल है।
ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर उठते सवाल: सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
ग्राहम के इस बयान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर विशेषज्ञों और आम जनता के बीच इस बात को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है कि क्या अमेरिका अब खुले तौर पर अन्य देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की नीति पर चल रहा है। कई यूजर्स का कहना है कि जब ट्रंप के इतने करीबी नेता टीवी पर आकर ऐसी बातें करते हैं, तो इसे व्यक्तिगत राय नहीं बल्कि प्रशासन की वास्तविक मंशा माना जाना चाहिए। यह स्वीकारोक्ति अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिका की छवि को ‘तेल के भूखे’ देश के रूप में और अधिक गहरा कर सकती है।
कौन हैं लिंडसे ग्राहम? भारत विरोध और कड़े तेवरों के लिए मशहूर
लिंडसे ग्राहम रिपब्लिकन पार्टी के एक प्रभावशाली और अनुभवी नेता हैं, जो पिछले दो दशकों से अमेरिकी सीनेट में सक्रिय हैं। उन्हें रूस और चीन के कट्टर विरोधी के रूप में जाना जाता है और वे अक्सर डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीतियों की खुलकर सराहना करते हैं। भारत के संदर्भ में भी उनके विचार काफी कड़े रहे हैं; उन्होंने पूर्व में भारत के खिलाफ सख्त बयान दिए हैं और भारतीय उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की धमकियाँ देकर सुर्खियां बटोरी थीं। अब ईरानी तेल पर उनके ताजा बयान ने एक बार फिर उन्हें वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
