भारत के गांव सदियों से आत्मनिर्भरता, सामूहिकता और सांस्कृतिक विविधता के प्रतीक रहे हैं। लेकिन बीते कुछ दशकों में ‘विकास’ की परिभाषा ने एक नई दिशा ली है-जहां गांवों को शहरों जैसा बनाने की होड़ लगी है। पक्की सड़कें, चमचमाती इमारतें, डिजिटल कनेक्टिविटी और मॉल संस्कृति को ग्रामीण प्रगति का मानक माना जा रहा है। […]
