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Lord Krishna Dehtyang : इसी पेड़ के नीचे श्रीकृष्ण ने त्यागी थी देह, आज भी मौजूद है साक्ष्य

Lord Krishna Dehtyang

Lord Krishna Dehtyang : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में कई अत्यंत पावन और सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थलों का वर्णन मिलता है, जहां प्रत्येक वर्ष करोड़ों की संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन करने और आत्मिक शांति प्राप्त करने पहुंचते हैं। इन्हीं ऐतिहासिक और अलौकिक स्थानों में गुजरात राज्य के वेरावल (सोमनाथ) के निकट स्थित भालका तीर्थ मुख्य रूप से शामिल है। भालका तीर्थ को हिंदू धर्म में एक बेहद पवित्र, अद्वितीय और ऐतिहासिक स्थल का दर्जा प्राप्त है। पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह वही परम पावन भूमि है जहां भगवान विष्णु के आठवें अवतार प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी लौकिक लीलाओं को समेटते हुए अपनी देह का त्याग किया था।

द्वापर युग के अंत और भगवान श्रीकृष्ण के महाप्रयाण की कथा

यही मुख्य कारण है कि हर साल देश-विदेश से भारी संख्या में कृष्ण भक्त इस स्थान के दर्शन के लिए खिंचे चले आते हैं। इस पूरे क्षेत्र के वातावरण में एक अद्भुत धार्मिक आस्था, सकारात्मक ऊर्जा और असीम शांति घुली हुई है, जिससे यहां आने वाले तीर्थयात्रियों को अद्वितीय आध्यात्मिक सुकून का अनुभव होता है। प्राचीन पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत युद्ध की समाप्ति के वर्षों बाद एक दिन भगवान श्रीकृष्ण इस क्षेत्र में एक विशाल पेड़ के नीचे योग निद्रा में विश्राम कर रहे थे। उसी समय ‘जरा’ नाम का एक व्याध (शिकारी) वहां शिकार की खोज में आया। उसने झाड़ियों के बीच से प्रभु श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में चमकते पद्म चिह्न को किसी मृग (हिरण) की चमकदार आंख समझ लिया और अनजाने में एक विषैला बाण (तीर) चला दिया।

शिकारी को क्षमादान और भालका तीर्थ नाम पड़ने का मुख्य कारण

जब शिकारी अपने शिकार को पकड़ने के लिए पेड़ के समीप पहुंचा, तो भगवान श्रीकृष्ण को लहूलुहान अवस्था में देखकर वह अत्यंत भयभीत हो गया और थर-थर कांपते हुए प्रभु के चरणों में गिरकर रोने लगा। दया के सागर भगवान श्रीकृष्ण ने उस विकल शिकारी को बिल्कुल भी दंडित नहीं किया, बल्कि उसे सांत्वना देते हुए सहर्ष क्षमादान दे दिया और इसे नियति का नियम बताया। इसके पश्चात प्रभु ने अपनी इस भूलोक की लीला को समाप्त करने की घोषणा की। स्थानीय मान्यताओं और जानकारों के अनुसार, शिकारी के तीर (भल) के कारण ही इस पावन स्थान का नाम कालांतर में ‘भालका तीर्थ’ पड़ा। हिंदू धर्मग्रंथों में इस अत्यंत महत्वपूर्ण घटना को द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ के संधिकाल से भी जोड़ा जाता है।

मंदिर परिसर में स्थापित भगवान कृष्ण की विश्राम मुद्रा वाली अलौकिक प्रतिमा

भालका तीर्थ न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी बेहद विशेष और दर्शनीय है। यहां बने आधुनिक व भव्य मंदिर के आसपास का पूरा परिसर अत्यंत सुंदर, हरा-भरा और मानसिक शांति प्रदान करने वाला है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान श्री कृष्ण की एक बेहद सुंदर और सजीव प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसमें वे पीपल के वृक्ष के नीचे विश्राम की मुद्रा में लेटे हुए हैं और उनके समीप ही हाथ जोड़े शिकारी जरा की मूर्ति भी बनी हुई है। यहां आने वाले श्रद्धालु अत्यंत भावुक होकर पूजा-अर्चना करते हैं और द्वारकाधीश श्रीकृष्ण के धरती पर बिताए गए अंतिम क्षणों का स्मरण कर उन्हें नमन करते हैं।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग और भालका तीर्थ का आपस में अटूट संबंध

इस परम पवित्र तीर्थ स्थल का सीधा संबंध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम माने जाने वाले सोमनाथ महादेव मंदिर से भी जुड़ा हुआ है। धार्मिक ग्रंथों में यह दृढ़ मान्यता है कि भालका तीर्थ में बाण लगने के बाद प्रभु श्रीकृष्ण यहां से कुछ दूरी पर स्थित हिरण, कपिला और सरस्वती नदी के पवित्र त्रिवेणी संगम पर पहुंचे थे, जिसे ‘देहोत्सर्ग तीर्थ’ कहा जाता है। वहीं से उन्होंने अपने पांचभौतिक शरीर को त्यागकर साक्षात बैकुंठ धाम के लिए प्रस्थान किया था। इसी अटूट धार्मिक संबंध के कारण, जो भी श्रद्धालु सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने गुजरात आते हैं, वे अपनी यात्रा को पूर्ण करने के लिए भालका तीर्थ में भगवान कृष्ण के चरणों में शीश नवाने जरूर जाते हैं।

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