केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले कथित भेदभाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी बहस तेज हो गई है। बुधवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार की आड़ में किसी धर्म की बुनियादी मान्यताओं को समाप्त या खोखला नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि आस्था और विवेक से जुड़े गहरे धार्मिक मामलों को केवल तर्कों की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता और न ही इन पर उस तरह बहस हो सकती है जैसे अन्य दीवानी मामलों पर होती है। यह टिप्पणी उन याचिकाओं के संदर्भ में आई है जो धार्मिक परंपराओं और लैंगिक समानता के बीच संतुलन की मांग कर रही हैं।
एडवोकेट इंदिरा जयसिंह की दलील: फैसले के बावजूद मंदिर प्रवेश में बाधा
सुनवाई के 10वें दिन वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट के समक्ष पुरजोर तरीके से अपनी बात रखी। उन्होंने तर्क दिया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने वाला सुप्रीम कोर्ट का पिछला फैसला अभी भी प्रभावी है और इस पर कोई आधिकारिक ‘स्टे’ या रोक नहीं लगाई गई है। इसके बावजूद, वास्तविकता यह है कि महिलाओं को मंदिर के भीतर प्रवेश पाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जयसिंह ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक आदेशों का पालन जमीन पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि संवैधानिक अधिकारों का हनन न हो।
धर्म की अनिवार्यता का प्रश्न: कौन तय करेगा परंपराओं का स्वरूप?
इंदिरा जयसिंह ने बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की ‘रिव्यू पिटिशन’ (पुनर्विचार याचिका) पर सुनवाई कर रहा है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु उठाते हुए कहा कि आमतौर पर अदालतें यह तय करने का अधिकार नहीं रखतीं कि किसी धर्म के भीतर क्या ‘अनिवार्य’ है और क्या नहीं। जयसिंह के अनुसार, किसी भी धर्म की रीतियों और अनिवार्यताओं का फैसला स्वयं उस धर्म की मान्यताओं और अनुयायियों द्वारा किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि संविधान के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता में स्वायत्तता का तत्व शामिल है।
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी: सभ्यता और धार्मिक इतिहास को नहीं भूल सकते
इस बहस के बीच जस्टिस बीवी नागरत्ना ने भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास का हवाला दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अदालत इस भूमि के सभ्यतागत विकास और सदियों पुराने धार्मिक इतिहास को नजरअंदाज नहीं कर सकती। जस्टिस नागरत्ना ने रेखांकित किया कि हमारे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26, जो धार्मिक स्वतंत्रता और प्रबंधन का अधिकार देते हैं, इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से निकलकर आए हैं। इस पर जयसिंह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन विषयों पर खुली बहस की आवश्यकता है क्योंकि संवैधानिक व्याख्याएं समय के साथ विकसित होती हैं।
केंद्र सरकार का पक्ष: पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध का दिया उदाहरण
7 अप्रैल से शुरू हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार ने महिलाओं के प्रवेश के विरोध में अपनी दलीलें पहले ही स्पष्ट कर दी हैं। सरकार का रुख परंपराओं के संरक्षण की ओर है। केंद्र की ओर से दलील दी गई थी कि भारत में विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए, क्योंकि यहाँ ऐसे कई देवी मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध है। सरकार ने तर्क दिया कि यदि पुरुषों के प्रवेश पर प्रतिबंध को परंपरा माना जाता है, तो सबरीमाला जैसी सदियों पुरानी प्रथाओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
आगे की राह: संवैधानिक पीठ के फैसले पर टिकी निगाहें
वर्तमान में यह मामला काफी जटिल मोड़ पर है, जहाँ एक तरफ व्यक्तिगत समानता का संवैधानिक अधिकार है और दूसरी तरफ समुदाय के धार्मिक प्रबंधन की स्वायत्तता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि अदालत आस्था के संवेदनशील मामलों में हस्तक्षेप करते समय बेहद सावधानी बरत रही है। पूरे देश की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में कोई बीच का रास्ता निकालता है या परंपराओं की सर्वोच्चता को बरकरार रखता है।
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