Supreme Court on Reserved Seats: सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों के दशकों तक एक ही क्षेत्र में बने रहने और उनका रोटेशन नहीं होने का मामला पहुंचा है। इस संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षित सीटों का रोटेशन करना विधायिका और संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का विषय है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि अदालत संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकती।
1952 से लगातार आरक्षित सीटें बने रहने पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि आजादी के बाद से लगभग 74-75 वर्षों के दौरान कई विधानसभा क्षेत्र लगातार SC/ST उम्मीदवारों के लिए आरक्षित बने हुए हैं। इससे समान सामाजिक और जनसंख्या परिस्थितियों वाले दूसरे क्षेत्रों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है। याचिका में मांग की गई कि विधानसभा की आरक्षित सीटों का भी पंचायतों और नगर निकायों की तरह समय-समय पर रोटेशन किया जाना चाहिए।
CJI सूर्यकांत बोले- संसद के तीसरे सदन की भूमिका नहीं निभा सकते
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि न्यायपालिका संसद के तीसरे सदन की तरह काम नहीं कर सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो इसके लिए संसद और संबंधित विधायी संस्थाओं के सामने आवाज उठाई जा सकती है। अदालत अपने स्तर पर ऐसा नया प्रावधान लागू नहीं कर सकती, जिसका मौजूदा संविधान और कानून में उल्लेख नहीं है।
बहुदलीय लोकतंत्र और जाति आधारित मतदान पर अदालत की टिप्पणी
पीठ ने कहा कि भारत में बहुदलीय लोकतंत्र की व्यवस्था है, जहां मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे जाति और धर्म के बजाय राजनीतिक दलों तथा उनकी विचारधारा के आधार पर मतदान करें। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब विधानसभा की आरक्षित सीटों के रोटेशन का स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है, तो न्यायपालिका किस आधार पर संसद या संबंधित प्राधिकारियों को ऐसा करने का निर्देश दे सकती है।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 का किया उल्लेख
सुनवाई में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 330 लोकसभा और अनुच्छेद 332 राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। हालांकि, ये प्रावधान आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करते हैं, लेकिन किसी विशेष विधानसभा क्षेत्र को आरक्षित करने या उसके रोटेशन की व्यवस्था तय नहीं करते।
पंचायत और नगर निकायों की व्यवस्था विधानसभा पर लागू नहीं
जस्टिस बागची ने कहा कि पंचायतों और नगरपालिकाओं के चुनाव में आरक्षित सीटों के रोटेशन के लिए संविधान में अलग व्यवस्था मौजूद है। लेकिन विधानसभा चुनावों के लिए वैसा ही प्रावधान नहीं है। इसलिए अदालत मौजूदा कानूनी ढांचे में ऐसा नियम नहीं जोड़ सकती, जो संविधान या संबंधित कानून में पहले से मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर सामाजिक प्रभावों और संभावित बदलावों का आकलन करना विधायिका का काम है।
CJI की वकील से टिप्पणी- गलत नंबर डायल कर रहे हैं आप
सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प स्थिति तब बनी, जब याचिकाकर्ता के वकील अपनी दलील मजबूती से रख रहे थे। इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की, ‘आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि यह धरना-प्रदर्शन का मौसम है और इस मुद्दे को उठाने के लिए संबंधित मंच का सहारा लिया जा सकता है। वकील ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध करने का इरादा नहीं है और गला खराब होने के कारण उनकी आवाज ऐसी लग रही है।
क्या थी याचिका में मुख्य मांग?
याचिकाकर्ता का आरोप था कि लंबे समय से कुछ सीटें आरक्षित रहने के कारण चुनाव लड़ने के इच्छुक दूसरे उम्मीदवारों के अवसर सीमित हो रहे हैं और आरक्षण का लाभ कुछ परिवारों तक सिमटने की आशंका है। याचिका में विधानसभा की SC/ST आरक्षित सीटों पर भी रोटेशन लागू करने की मांग की गई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था में बदलाव का फैसला विधायिका और सक्षम संवैधानिक प्राधिकारियों को ही करना होगा।

