हिंदू पंचांग का तीसरा माह ज्येष्ठ तप, सेवा और पुण्य लाभ के लिए विशेष माना गया है। इस माह में तेज धूप और गर्मी के साथ धार्मिक तपस्या का महत्व बढ़ जाता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण और अन्य ग्रंथों में उल्लेख है कि इस समय जल सेवा, व्रत, स्नान और विशेष पूजा से अद्भुत पुण्य की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं, इस पवित्र माह में कौन से 6 नियमों का पालन कर आप भी ईश्वर की कृपा पा सकते हैं।
गंगा स्नान और जल सेवा का विशेष महत्व
ज्येष्ठ माह में गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। यदि नदी में स्नान संभव न हो तो घर में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इस माह में जल दान सबसे श्रेष्ठ होता है। राहगीरों और प्यासों को ठंडा जल, शरबत, बेल का शरबत या छाछ पिलाना अत्यंत पुण्यदायी होता है। शास्त्रों में इसे ‘अक्षय पुण्य’ कहा गया है। घर के बाहर प्याऊ लगाना भी बहुत फलदायक होता है।
भगवान विष्णु, सूर्यदेव और हुनमान जी की करें विशेष पूजा
इस माह में विशेषकर भगवान विष्णु, सूर्यदेव, हनुमान जी की आराधना से स्वास्थ्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें, तुलसी को जल दें और सुबह के समय सूर्य को अर्घ्य दें। सूर्य मंत्र “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जाप करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें और मंगलवार का व्रत भी रख सकते हैं। वहीं रविवार का उपवास भी इस समय विशेष फल देता है। व्रत, ध्यान और मंत्रजप से तन-मन की शुद्धि होती है और कर्मों का शोधन होता है।
फल, जल व छाछ का करें दान
ज्येष्ठ माह में ठंडी और ताजगी देने वाली वस्तुओं का दान विशेष फलदायी होता है। विशेषकर खरबूजा, तरबूज, बेलफल, चावल, गुड़, छाछ, जल पात्र और छाता दान करना शुभ माना जाता है। इन वस्तुओं का दान राहगीरों, गरीबों और ब्राह्मणों को करें। जल भरकर घड़ा दान करना ‘घृत दान’ के बराबर पुण्य देता है। इस माह में दान की भावना जितनी निष्काम होती है, उसका फल उतना ही बड़ा होता है।
क्रोध, मांसाहार और तामसिकता से करें परहेज
इस माह में शरीर और मन दोनों की शुद्धता आवश्यक है। इसलिए मांसाहार, मद्यपान, अधिक मसालेदार भोजन, क्रोध, झूठ और व्यर्थ विवाद से दूर रहें। शुद्ध और सात्विक आहार लें, जिससे शरीर हल्का और मन शांत बना रहे। ज्येष्ठ माह तपस्या का समय है, इसलिए आत्म-नियंत्रण, मौन और विनम्रता के अभ्यास से पुण्य में वृद्धि होती है। यह समय खुद को सुधारने और संयम में रहने का है।
एक समय भोजन और व्रत का पालन करें
ज्येष्ठ माह में व्रत रखने का अत्यधिक महत्व है। सोमवार, एकादशी, मंगलवार, अमावस्या और पूर्णिमा को एक समय भोजन करना, फलाहार लेना अथवा उपवास रखना स्वास्थ्य और आत्मशुद्धि के लिए उत्तम है। व्रत के दौरान प्रभु नाम का जप और ध्यान अवश्य करें। यह न केवल पाचन तंत्र को सुधारता है, बल्कि मन को भी एकाग्र करता है और अध्यात्मिक उन्नति में सहायक होता है।
पौधरोपण और पर्यावरण सेवा करें
गर्मी के इस मौसम में पौधरोपण, पौधों को जल देना और पशु-पक्षियों को जल-पात्र रखना पुण्य का कार्य माना गया है। पीपल, नीम, तुलसी जैसे औषधीय पौधों की सेवा करें। पेड़ों के नीचे जल पात्र रखें, जहां पक्षी आकर पानी पी सकें। शास्त्रों के अनुसार, एक पौधा लगाने से दस यज्ञों के बराबर फल मिलता है। पर्यावरण रक्षा ही आज की सच्ची सेवा और धार्मिकता है।
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