किसी व्यक्ति के निधन के उपरांत उसके परिजनों द्वारा गरूण पुराण का आयोजन किया जाना हिंदू धर्म की एक महत्वपूर्ण और पुरातन परंपरा है। यह धार्मिक अनुष्ठान केवल एक कर्मकांड मात्र नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला एक आध्यात्मिक प्रयास होता है। गरूण पुराण को 18 पुराणों में से एक माना गया है और इसे भगवान विष्णु ने गरूण जी को उपदेश स्वरूप सुनाया था, जिससे इसे ‘गरूण पुराण’ कहा गया।
गरूण पुराण के आयोजन का मुख्य उद्देश्य दिवंगत आत्मा को अगले जीवन की यात्रा में मार्गदर्शन प्रदान करना होता है। मान्यता है कि यह पाठ मृतात्मा को यमलोक की यात्रा के दौरान आने वाले कष्टों से मुक्ति दिलाता है और उसे मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यह पुराण मृत्यु के पश्चात के कर्मों, यमलोक की स्थितियों, पाप-पुण्य के फल, पुनर्जन्म की प्रक्रिया और आत्मा के अंतिम गंतव्य के बारे में विस्तृत जानकारी देता है।
गरूण पुराण का पाठ प्रायः व्यक्ति की मृत्यु के बाद 13 दिन तक प्रतिदिन कराया जाता है, विशेष रूप से ब्राह्मणों के माध्यम से। इस दौरान श्रद्धालुजन धर्म, कर्म, और मोक्ष संबंधी गूढ़ रहस्यों को सुनते हैं, जिससे जीवित लोगों को भी जीवन की सच्चाई और अच्छे कर्मों की प्रेरणा मिलती है। यह पाठ मनुष्य को अपने जीवन के उद्देश्य और कर्तव्यों की ओर उन्मुख करता है।
पंडित विमलेश मिश्र बताते हैं कि गरूण पुराण का श्रवण न केवल मृत आत्मा के लिए लाभकारी होता है, बल्कि जीवित परिजनों के लिए भी यह दुख की घड़ी में मानसिक शांति, आध्यात्मिक संबल और मोक्ष की प्रेरणा प्रदान करता है।
गरूण पुराण केवल मृत्यु के बाद की एक रस्म नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के रहस्यों को समझने और दिवंगत आत्मा को विदाई देने की एक सशक्त आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जो सनातन धर्म की महान परंपराओं में एक विशेष स्थान रखती है।

जीवन जीने के लिए यह शिक्षा आवश्यक है।संस्कार के बिना मानव को दानव के रूप में देख रहे हैं।भारत में सनातन धर्म से संस्कार जीवित रह सकता है।