डायरिया: छोटे बच्चों का प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) पूरी तरह विकसित नहीं होता है। जन्म के बाद पहले कुछ महीनों तक शिशु संक्रमणों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। डायरिया पैदा करने वाले वायरस, बैक्टीरिया या परजीवी शिशुओं की आंतों पर सीधा असर डाल सकते हैं। ऐसे में, थोड़ा सा भी दूषित भोजन या पानी शिशु को बीमार कर सकता है। हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि शिशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है, इसलिए शुरुआती महीनों में उनका विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। स्वच्छता और स्तनपान इस खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
गंदे हाथों से दूध पिलाना या खाना खिलाना
अक्सर माता-पिता या देखभाल करने वाले व्यक्ति बिना हाथ धोए ही बच्चे को दूध पिलाते हैं या खाना खिलाते हैं। इस दौरान हाथों पर मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया बच्चे के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे डायरिया हो सकता है। चूंकि शिशु की आंतें अत्यंत संवेदनशील होती हैं, इसलिए थोड़े से बैक्टीरिया भी उसे बीमार कर सकते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि हर बार दूध या खाना देने से पहले हाथों को अच्छे से धोना चाहिए, और बच्चे के बर्तन भी पूरी तरह साफ होने चाहिए।
दूषित पानी या बोतल से संक्रमण
जो शिशु फॉर्मूला दूध लेते हैं या बोतल से दूध पीते हैं, उनके लिए साफ पानी और बोतल की स्वच्छता अत्यंत जरूरी है। अगर पानी या बोतल अच्छी तरह उबाली नहीं गई हो, तो उसमें मौजूद जीवाणु शिशु को डायरिया का शिकार बना सकते हैं। कई बार माता-पिता बाहर का बोतलबंद पानी उपयोग कर लेते हैं, जो भी संक्रमित हो सकता है। इसलिए डॉक्टर सलाह देते हैं कि बोतल को हर बार गर्म पानी में उबालें और पानी को भी अच्छी तरह उबालकर ही उपयोग करें।
गंदे खिलौनों या चीजों को मुंह में डालना
छोटे बच्चे अक्सर जो चीज सामने आती है, उसे मुंह में डाल लेते हैं। यह उनकी उम्र का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन अगर खिलौने या वस्तुएं गंदी हों, तो उनमें मौजूद बैक्टीरिया या वायरस सीधे उनके पाचन तंत्र में चले जाते हैं। इससे दस्त, उल्टी और डायरिया की समस्या हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, शिशुओं के संपर्क में आने वाली वस्तुओं की नियमित रूप से सफाई करना अनिवार्य है और घर के फर्श व कोनों को भी स्वच्छ रखना चाहिए।
एंटीबायोटिक या दवाओं का दुष्प्रभाव
कई बार किसी अन्य बीमारी के इलाज में दिए गए एंटीबायोटिक्स या दवाओं का असर शिशु के पाचन तंत्र पर पड़ता है। ये दवाएं आंतों के अच्छे बैक्टीरिया को भी खत्म कर देती हैं, जिससे डायरिया की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए बच्चों को बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा नहीं देनी चाहिए। अगर शिशु को पहले से दवाएं दी जा रही हैं और डायरिया के लक्षण नजर आएं, तो तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें।
स्तनपान बंद कर देना या अनियमितता
शिशुओं को छह महीने तक केवल मां का दूध दिया जाना चाहिए। अगर इस अवधि में स्तनपान बंद कर दिया जाए या अनियमित कर दिया जाए, तो शिशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। मां के दूध में मौजूद ऐंटीबॉडीज शिशु को बैक्टीरियल और वायरल संक्रमणों से बचाती हैं। यदि मां स्तनपान छोड़ देती हैं और बाहर का दूषित दूध या भोजन दिया जाता है, तो डायरिया का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए स्तनपान को नियमित बनाए रखना बेहद जरूरी है।

मौसम बदलाव और वायरल संक्रमण
मौसम बदलने पर वातावरण में बैक्टीरिया और वायरस की संख्या बढ़ जाती है। शिशुओं का शरीर इन बदलावों के प्रति बहुत संवेदनशील होता है। विशेष रूप से मानसून और सर्दियों में डायरिया के केस तेजी से बढ़ते हैं। वायरल डायरिया आमतौर पर रोटावायरस के कारण होता है, जो शिशुओं को अधिक प्रभावित करता है। ऐसे में बच्चों को मौसम के अनुसार कपड़े पहनाना, संक्रमण से बचाना और समय पर टीकाकरण कराना आवश्यक होता है।
साफ-सफाई की अनदेखी
शिशु के आसपास की साफ-सफाई अत्यंत जरूरी होती है क्योंकि वे हर चीज को छूते और मुंह में डालते हैं। यदि शिशु का बिस्तर, कपड़े, नैपी या खेलने का स्थान साफ नहीं है, तो वहां पनपने वाले बैक्टीरिया या वायरस शिशु के शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। विशेषकर अगर बच्चे की नैपी को समय पर न बदला जाए, तो उसमें मौजूद बैक्टीरिया मल के माध्यम से संक्रमण फैला सकते हैं। इसके अलावा अगर घर का वातावरण स्वच्छ नहीं है और कीटाणुओं से भरा है, तो भी डायरिया होने की आशंका रहती है। इसलिए घर की नियमित सफाई, खिलौनों को कीटाणु रहित करना और शिशु के नहाने और सोने की जगह को स्वच्छ बनाए रखना जरूरी है।
टीकाकरण की अनदेखी
डायरिया से बचाव के लिए कुछ विशेष टीके उपलब्ध हैं, जिनमें रोटावायरस वैक्सीन सबसे महत्वपूर्ण है। यह वायरस शिशुओं में डायरिया के गंभीर मामलों का एक प्रमुख कारण होता है। यदि यह टीका समय पर न लगे, तो शिशु गंभीर संक्रमण का शिकार हो सकता है। भारत सरकार के यूनिवर्सल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम में यह वैक्सीन शामिल है और इसे जन्म के बाद के पहले 6 महीनों के अंदर देना जरूरी होता है। माता-पिता की लापरवाही या जानकारी के अभाव में अगर यह टीका छूट जाए, तो डायरिया की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए समय-समय पर शिशु का टीकाकरण करवाना न केवल डायरिया, बल्कि अन्य जानलेवा बीमारियों से भी उसकी सुरक्षा करता है।
स्तनपान कराने वाली मां की डाइट का असर
शिशु के स्वास्थ्य पर उसकी मां की डाइट का सीधा प्रभाव पड़ता है, खासकर तब जब बच्चा पूरी तरह से स्तनपान पर निर्भर हो। यदि मां का खानपान अस्वास्थ्यकर या संक्रमित है, तो यह दूध के माध्यम से शिशु तक पहुंच सकता है और डायरिया का कारण बन सकता है। इसके अलावा अगर मां अधिक मसालेदार, बासी या दूषित भोजन करती है, तो उसका असर दूध की गुणवत्ता पर पड़ता है। इसलिए स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अपने आहार में ताजे, सुपाच्य और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। उन्हें खुद भी स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए ताकि बच्चे को संक्रमण से बचाया जा सके।
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